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मोदी-पेजेश्कियान की मुलाकात से अमेरिका क्यों बेचैन? रुबियो की चेतावनी ने बढ़ाई कूटनीतिक गर्मी


भारत ने ईरान से व्यापार बढ़ाने के संकेत दिए, वॉशिंगटन ने तुरंत खींची लाल रेखा; असली चिंता प्रतिबंधों और ईरान की कमाई को लेकर


नई दिल्ली। बिश्केक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की मुलाकात के बाद भारत-अमेरिका संबंधों की कूटनीति में अचानक नया तनाव दिखाई देने लगा है। एससीओ शिखर सम्मेलन से इतर हुई बातचीत में दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा की। प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान के साथ भारत की दीर्घकालीन मित्रता दोहराते हुए व्यापार को विस्तार देने और उसमें विविधता लाने की बात कही। 



यही संकेत वॉशिंगटन को असहज करने के लिए काफी थे। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें नहीं लगता कि भारत और ईरान के बीच कोई व्यापार समझौता हो रहा है, लेकिन साथ ही उन्होंने साफ चेतावनी दी कि कोई भी देश ईरान को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने में मदद न करे। 


रुबियो का तर्क है कि अगर कोई देश तेहरान को ऐसे रास्ते उपलब्ध कराता है, जिनसे वह राजस्व जुटा सके और फिर उस धन का इस्तेमाल आतंकवाद या परमाणु हथियारों की कोशिशों के लिए कर सके, तो अमेरिका इसे स्वीकार नहीं करेगा। यह बयान सीधे तौर पर भारत का नाम लेकर हमला नहीं था, लेकिन मोदी-पेजेश्कियान मुलाकात के तुरंत बाद आया होने के कारण इसका संदेश स्पष्ट था। 


अमेरिका की बेचैनी की असली वजह क्या है?


भारत और ईरान के बीच व्यापार पिछले वर्षों में अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में काफी घटा है। 2025-26 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार करीब 1.63 अरब डॉलर रहा, जबकि 2018-19 में यह 17 अरब डॉलर से अधिक था। ऐसे में भारत द्वारा व्यापार बढ़ाने की इच्छा वॉशिंगटन की ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की रणनीति से टकराती दिखाई देती है। 


लेकिन भारत के लिए मामला केवल व्यापार का नहीं है। ईरान भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, मध्य एशिया तक संपर्क और क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, अमेरिका चाहता है कि ईरान पर आर्थिक दबाव कमजोर न पड़े।


इसलिए बिश्केक की मुलाकात के बाद असली सवाल यही है—


भारत अपनी विदेश नीति अमेरिकी दबाव से तय करेगा या अपने आर्थिक और सामरिक हितों के आधार पर?


फिलहाल मोदी सरकार ने ईरान के साथ व्यापार बढ़ाने की इच्छा जताई है, जबकि रुबियो की चेतावनी बता रही है कि वॉशिंगटन इस दिशा में भारत के हर कदम पर बारीकी से नजर रख रहा है।

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