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मेंटेनेंस के नाम पर खर्च, फिर भी इंदौर अंधेरे में!

देवगुराड़िया से पाटनीपुरा तक फॉल्ट की मार; एमडी अनूप सिंह और मुख्य अभियंता राजेश जैन से जनता पूछ रही—आखिर मेंटेनेंस का नतीजा कहां है?

प्रणव बजाज

इंदौर। बिजली का बिल समय पर चाहिए, वसूली में कोई ढिलाई नहीं चाहिए, लेकिन जब उपभोक्ता को घंटों अंधेरे में रहना पड़े तो जवाब देने वाला कोई नहीं? इंदौर में बिजली कटौती और बार-बार फॉल्ट की शिकायतों ने पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया है।



देवगुराड़िया, पाटनीपुरा, मालवा मिल और न्यू देवास रोड जैसे इलाकों में बिजली आपूर्ति को लेकर उपभोक्ताओं की परेशानी सामने आ रही है। सवाल किसी एक लाइनमैन या एक बिजलीघर का नहीं है। सवाल उस पूरी व्यवस्था का है जिसमें रखरखाव के लिए पैसा भी खर्च होता है, अधिकारी भी मौजूद हैं और फिर भी फॉल्ट खत्म नहीं होते।


कंपनी के अपने सार्वजनिक रिकॉर्ड में प्रबंध निदेशक अनूप कुमार सिंह और इंदौर के मुख्य अभियंता राजेश जैन के नाम लगातार सामने आते हैं। हालिया कंपनी रिकॉर्ड में अतिरिक्त मुख्य अभियंता संजय जैन का भी उल्लेख है।


अब इन अधिकारियों से सवाल पूछना जरूरी है—इंदौर शहर में पिछले तीन वर्षों में मेंटेनेंस पर कितना पैसा खर्च हुआ?


किस फीडर पर कितना खर्च?


कितने ट्रांसफार्मर बदले?


कितनी केबल बदली?


कितने पुराने उपकरण हटाए?


किस ठेकेदार को कितना भुगतान हुआ?


और सबसे बड़ा सवाल—मेंटेनेंस के बाद भी वही फीडर बार-बार क्यों फेल हो रहे हैं?


सरकारी ई-निविदा पोर्टल पर पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के विभिन्न विद्युत कार्यों की निविदाएं और अनुमान दर्ज हैं। यानी बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए योजनाएं और धनराशि दोनों मौजूद हैं।


फिर इंदौर की जनता को परिणाम क्यों नहीं मिल रहा?


देवगुराड़िया का सवाल सबसे अहम


देवगुराड़िया और आसपास तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्र में विद्युत भार बढ़ रहा है। ऐसे क्षेत्रों में भविष्य की जरूरत को देखते हुए नेटवर्क मजबूत करना बिजली कंपनी की जिम्मेदारी है। यदि लोड बढ़ने के बावजूद पुराना ढांचा ही चलता रहा तो फॉल्ट होना कोई आश्चर्य नहीं।


लेकिन तब सवाल यह है कि क्षमता बढ़ाने की योजना कहां है?


और यदि योजना पर पैसा खर्च हो चुका है तो उसका परिणाम जमीन पर क्यों नहीं दिख रहा?


फोन नहीं उठा तो व्यवस्था किसके लिए?


पाटनीपुरा क्षेत्र से जुड़े 0731-2435860 नंबर पर फोन नहीं उठने की शिकायत भी सामने आई है। यदि यह शिकायत सही है तो कंपनी को इसकी जांच करनी चाहिए।


बिजली बंद होने के समय उपभोक्ता सबसे पहले सहायता चाहता है। उसे यह पता होना चाहिए कि फॉल्ट कहां है और बिजली कब तक आएगी।


यदि स्थानीय कार्यालय फोन नहीं उठाता और उपभोक्ता एक नंबर से दूसरे नंबर पर घूमता है तो फिर शिकायत व्यवस्था केवल कागज पर रह जाती है।


अनूप सिंह और राजेश जैन से पांच सीधे सवाल


पहला— इंदौर शहर का पिछले तीन साल का कुल मेंटेनेंस बजट कितना है?


दूसरा— इस राशि में से कितना भुगतान हो चुका है और किस-किस एजेंसी या ठेकेदार को हुआ?


तीसरा— सबसे ज्यादा फॉल्ट वाले दस फीडर कौन से हैं?


चौथा— इन फीडरों पर पिछले तीन वर्षों में कितना मेंटेनेंस खर्च हुआ?


पांचवां— खर्च के बावजूद फॉल्ट कम क्यों नहीं हुए?


यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बिजली कटौती की अवधि और आवृत्ति को लेकर नियामकीय स्तर पर आंकड़े दर्ज किए जाते हैं। यानी विभाग के पास समस्या को आंकड़ों में साबित करने और उसका समाधान मापने का पूरा आधार है।


जनता बिल देती है, अब हिसाब भी मांगेगी


इंदौर को आर्थिक राजधानी कहा जाता है। उद्योगों से लेकर छोटे कारोबार और आम परिवार तक बिजली पर निर्भर हैं। घंटों बिजली बंद होना केवल घरेलू परेशानी नहीं—यह कारोबार, पानी, अस्पताल, दुकान और रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।


इसलिए अब सरकार को केवल “फॉल्ट ठीक कर दिया गया” की सूचना देकर आगे नहीं बढ़ना चाहिए।


मेंटेनेंस का पैसा कहां गया?


काम किसने किया?


जांच किसने की?


भुगतान किसने मंजूर किया?


और काम के बाद भी फॉल्ट क्यों जारी हैं?


इन सवालों के जवाब आने तक यह मामला खत्म नहीं होना चाहिए।


बौद्धिक प्रतिकार का सवाल


इंदौर की जनता से बिजली का पूरा बिल लिया जाता है। अब जनता को बिजली व्यवस्था का पूरा हिसाब भी चाहिए।


अनूप सिंह से जवाब चाहिए।

राजेश जैन से जवाब चाहिए ।


और सरकार से सबसे बड़ा सवाल—


अगर मेंटेनेंस सही हुआ है तो इंदौर बार-बार अंधेरे में क्यों डूब रहा है?

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