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इंदौर में शराब का ‘खुला खेल’: ठेकों से सड़क तक सवाल—पुलिस शराब पकड़ रही या सिर्फ करोड़ों का हिसाब?

 

विशेष रिपोर्ट | प्रणव बजाज


इंदौर में शराब कारोबार अब सिर्फ ठेकों तक सीमित सवाल नहीं रह गया है। स्कूल और धार्मिक स्थलों के आसपास दुकानों की मौजूदगी, मनमानी कीमतों की शिकायतें, बंद अहातों के बावजूद सार्वजनिक जगहों पर शराबखोरी और लगातार सामने आ रही अवैध शराब की बड़ी खेपें—ये सब मिलकर आबकारी व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।



कागज पर व्यवस्था कितनी सख्त है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2025 में एमआरपी से जुड़े मामलों में इंदौर जिले की 17 शराब दुकानों पर कुल ₹43.75 लाख का जुर्माना लगाया गया था। जिले की 173 शराब दुकानों पर सही कीमत जानने के लिए QR कोड भी लगाए गए। लेकिन सवाल यह है कि QR कोड के बावजूद ग्राहक से अधिक कीमत वसूलने की शिकायतें क्यों खत्म नहीं हुईं?


स्कूल-मंदिर के पास दुकानों का मामला भी कम पेचीदा नहीं है। हाईकोर्ट के एक मामले में 2018 के नियमों की व्याख्या के आधार पर सामान्य को-एड स्कूल और हर धार्मिक स्थल को समान प्रतिबंध के दायरे में नहीं माना गया। यानी नियमों की तकनीकी सीमा ने कई विवादों को अदालत तक पहुंचने के बावजूद अलग परिणाम दिया।


अहातों पर प्रतिबंध के बाद भी यदि दुकानों के आसपास टीन शेड, ढाबों या अन्य स्थानों पर शराबखोरी हो रही है तो सवाल सीधा है—जिम्मेदारी किसकी है? हाल ही में राज्य स्तर पर अवैध अहातों को तत्काल बंद करने के निर्देश दिए गए हैं।


और इंदौर में कार्रवाई के आंकड़े खुद तस्वीर बताते हैं। सितंबर में दो बड़ी कार्रवाइयों में एक करोड़ रुपये से अधिक की अवैध शराब जब्त होने की रिपोर्ट सामने आई। इससे बड़ा सवाल यही है कि इतनी बड़ी खेपें शहर तक पहुंचने से पहले निगरानी तंत्र को क्यों नहीं दिखतीं?


पुलिस और आबकारी विभाग शराब पकड़ रहे हैं, लेकिन जनता पूछ रही है—क्या हर बार कार्रवाई शराब मिलने के बाद ही होगी?


मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और आबकारी मंत्री जगदीश देवड़ा के सामने अब सवाल केवल राजस्व का नहीं, सार्वजनिक व्यवस्था और जवाबदेही का भी है। कलेक्टर, आबकारी अधिकारी, पुलिस, ठेकेदार और स्थानीय प्रशासन—जिसके हिस्से में जो जिम्मेदारी है, उसका हिसाब सार्वजनिक क्यों न हो?


सवाल यह नहीं कि कितनी शराब पकड़ी गई। सवाल यह है कि कितनी शराब पहुंची, किस रास्ते पहुंची और उसे रोकने वाला तंत्र आखिर कर क्या रहा था?


सागर की जहरीली शराब त्रासदी के बाद यह सवाल और भारी हो गया है—इंदौर को किसी बड़ी घटना का इंतजार तो नहीं?

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