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जनता की जेब, साहब की तिजोरी

 


व्यंगः प्रणव बजाज

नेता जी: “मैंने जनता की सेवा की है।”

जनता: “जी हाँ साहब, सेवा ऐसी कि आपकी संपत्ति बढ़ती गई और हमारी EMI!” 


मंत्री जी: “हम भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त हैं।”

जनता: “इतने सख्त कि भ्रष्टाचार पकड़े जाने तक आराम से चलता रहे?”


अफसर साहब: “मेरे पास सब कुछ मेहनत की कमाई है।”

जनता: “फिर सरकारी वेतन की पर्ची और संपत्ति की सूची में इतना बड़ा प्रेम-वियोग क्यों है?” 



नेता जी: “मेरे ऊपर लगाए गए आरोप राजनीति से प्रेरित हैं।”

जनता: “ठीक है साहब, राजनीति छोड़िए… बैंक खाते और संपत्ति के कागज दिखाइए!”


साहब: “जांच चल रही है।”

जनता: “जांच चल रही है या फाइल टहल रही है?”


साहब: “कानून अपना काम करेगा।”

जनता: “बस यही डर है साहब—कहीं कानून काम शुरू न कर दे, वरना तिजोरी का हिसाब देना पड़ेगा!”


नेता जी: “जनता ने हमें चुना है।”

जनता: “वोट सेवा के लिए दिया था, संपत्ति का लाइफटाइम पैकेज लेने के लिए नहीं!”


अफसर: “हम व्यवस्था का हिस्सा हैं।”

जनता: “व्यवस्था का हिस्सा बनिए, व्यवस्था की मलाई का हिस्सा नहीं!”


और जनता का आखिरी सवाल—


“साहब, पांच साल पहले आपकी संपत्ति कितनी थी?”

“अब कितनी है?”

“बीच का चमत्कार किस योजना के तहत हुआ?” 😏


अब जनता को भाषण नहीं चाहिए—

हिसाब चाहिए।


आरोप है तो निष्पक्ष जांच हो।

दोष सिद्ध है तो कानून के मुताबिक कठोर कार्रवाई हो।

अवैध संपत्ति साबित हो तो कानून के तहत जब्त करके जनता के हित में लगाई जाए।


स्कूल की टूटी बेंच पूछ रही है—

“मेरे पैसे से बंगला कैसे बन गया?”


सरकारी अस्पताल पूछ रहा है—

“दवा के बजट से गाड़ी कैसे आ गई?”


बेरोजगार युवा पूछ रहा है—

“मेरी नौकरी का पैसा किसकी तिजोरी में पहुंच गया?”


और लोकतंत्र पूछ रहा है—


“कुर्सी सेवा के लिए मिली थी या संपत्ति बढ़ाने के लिए?”


अब जनता जाग चुकी है।


जनता का पैसा — जनता के काम आएगा।

भ्रष्टाचार का हिसाब — कानून के सामने होगा।

लूट की कमाई — नहीं चलेगी!

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