नई दिल्ली । बौद्धिक प्रतिकार
शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के उस आधार पर सवाल उठाए हैं, जिसमें विधानसभा में विधायकों के बहुमत को पार्टी की पहचान तय करने में महत्वपूर्ण माना गया था। 17 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने पूछा कि चुनाव आयोग ने क्या सभी उपलब्ध विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया था।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने यह सवाल भी उठाया कि मतदाता अक्सर उम्मीदवार के बजाय राजनीतिक दल और उसके चुनाव चिह्न को ध्यान में रखकर मतदान करता है। ऐसे में यदि चुनाव जीतने के बाद कोई विधायक राजनीतिक रूप से दूसरी तरफ चला जाता है, तो उसके पुराने चुनावी वोटों को बाद में उसके नए गुट के समर्थन के रूप में कैसे माना जा सकता है?
दूसरी ओर, एकनाथ शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने दलील दी कि विधायी बहुमत को आधार बनाना कानूनी रूप से उचित था। उनके अनुसार 2019 में शिवसेना के 55 विजयी विधायकों में से 40 शिंदे गुट के साथ थे, जबकि 15 उद्धव ठाकरे गुट के साथ रहे।
पीठ ने यह भी पूछा कि यदि दोनों पक्षों के लिए उपलब्ध परीक्षण स्पष्ट न हों तो क्या चुनाव आयोग दोनों गुटों को पुराने ‘धनुष-बाण’ चिह्न से अलग कर अपने-अपने नए चिह्न पर चुनाव लड़ने का विकल्प दे सकता था। मामले में अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी। अभी सुप्रीम कोर्ट ने किसी पक्ष के पक्ष में अंतिम फैसला नहीं दिया है।

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