दो बजे तक फोन, सात बजे का अलार्म—क्या हम स्लीप क्राइसिस की तरफ बढ़ रहे हैं?

रात के दो बजे तक फोन की स्क्रीन पर नजरें और सुबह सात बजे का अलार्म—कई लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में यह आदत सामान्य होती जा रही है। सोशल मीडिया, वीडियो, चैटिंग और लगातार नोटिफिकेशन नींद के समय को पीछे धकेलते हैं। समस्या तब बढ़ती है जब कम नींद को रोज की दिनचर्या का हिस्सा बना लिया जाता है।



देर रात तक फोन इस्तेमाल करने से केवल सोने का समय ही प्रभावित नहीं होता। स्क्रीन की रोशनी और लगातार मानसिक उत्तेजना शरीर को आराम की स्थिति में जाने में बाधा डाल सकती है। इसके अलावा, फोन पर बिताया गया समय अक्सर सीधे सोने के समय को कम कर देता है। नतीजा—सुबह उठने पर थकान, दिन में नींद, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी महसूस हो सकती है।


वयस्कों को आमतौर पर नियमित रूप से कम से कम 7 घंटे की नींद की जरूरत होती है। हालांकि जरूरत व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और दिनचर्या के अनुसार बदल सकती है। लगातार नींद पूरी न होने पर कामकाज, मूड और शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है।


इससे बचने के लिए सोने से कुछ समय पहले फोन को अलग रखना, हर दिन लगभग एक ही समय पर सोना-जागना और रात में अनावश्यक स्क्रीन टाइम कम करना मददगार हो सकता है। अगर पर्याप्त समय सोने के बावजूद लगातार नींद, खर्राटे, सांस रुकने जैसी समस्या या अत्यधिक दिन की थकान बनी रहे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।


सवाल सिर्फ यह नहीं कि हम कितने घंटे सो रहे हैं, बल्कि यह भी है कि सोने से पहले हमारा फोन हमसे कितने घंटे छीन रहा है।

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