भोपाल। मध्य प्रदेश में अब कलेक्टर और संभागायुक्तों के कामकाज की समीक्षा और सख्त होने जा रही है। 15 सितंबर के बाद प्रस्तावित दो दिवसीय कमिश्नर-कलेक्टर कॉन्फ्रेंस में जिलों और संभागों के प्रदर्शन का विस्तृत आकलन किया जाएगा। माना जा रहा है कि समीक्षा के दौरान कमजोर प्रदर्शन करने वाले अधिकारियों पर तबादले की गाज गिर सकती है।
सरकार की निगाह सिर्फ कागजी प्रगति पर नहीं, बल्कि योजनाओं के वास्तविक क्रियान्वयन, राजस्व मामलों के निराकरण, कानून-व्यवस्था, विकास कार्यों, जनकल्याणकारी योजनाओं और आम लोगों की शिकायतों के समाधान जैसे बिंदुओं पर रहने की संभावना है।
इस बार अधिकारियों के लिए यह बैठक महज समीक्षा बैठक नहीं, बल्कि कामकाज की परीक्षा मानी जा रही है। जिन जिलों में योजनाओं की प्रगति कमजोर है या सरकार के तय लक्ष्यों को हासिल नहीं किया गया, वहां तैनात अधिकारियों से जवाब-तलब हो सकता है।
खास बात यह है कि सरकार अब अधिकारियों के प्रदर्शन को उनकी प्रशासनिक जिम्मेदारी से सीधे जोड़ने के संकेत दे रही है। यानी सिर्फ बैठक में प्रस्तुतीकरण और आंकड़े दिखाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि जमीन पर परिणाम भी दिखाने होंगे।
हालांकि तबादलों को लेकर अंतिम निर्णय सम्मेलन और उसके बाद सरकार की समीक्षा पर निर्भर करेगा। सवाल यह है कि क्या इस बार प्रदर्शन के नाम पर वास्तव में जवाबदेही तय होगी, या फिर तबादले भी प्रशासनिक व्यवस्था की सामान्य कवायद बनकर रह जाएंगे?
अगर सरकार सचमुच परिणाम आधारित प्रशासन चाहती है, तो अफसरों के मूल्यांकन में जनता की शिकायतें, योजनाओं का वास्तविक लाभ और जमीनी स्थिति भी शामिल करना होगा। तभी ‘परफॉर्मेंस रिपोर्ट’ व्यवस्था जवाबदेही का हथियार बन सकेगी।

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