इंदौर। हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के वराह अवतार का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को वराह जयंती मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के वराह स्वरूप की पूजा करने के साथ उनकी कथा पढ़ने और सुनने की परंपरा है। मान्यता है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ वराह भगवान का स्मरण करने से भक्तों को सुख-समृद्धि और भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
क्या है वराह अवतार की कथा?
पौराणिक कथा के अनुसार एक समय हिरण्याक्ष नाम का असुर अपनी शक्ति के अहंकार में देवताओं और तीनों लोकों को परेशान करने लगा। उसने पृथ्वी को समुद्र की गहराइयों में ले जाकर छिपा दिया। पृथ्वी के डूब जाने से समस्त सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा।
तब भगवान विष्णु ने वराह यानी जंगली सूअर का दिव्य रूप धारण किया। भगवान वराह विशाल स्वरूप में समुद्र में उतरे और अपनी शक्ति से पृथ्वी को खोज निकाला। इसके बाद उन्होंने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को अपने दांतों पर उठाकर समुद्र से बाहर निकाला और उसे दोबारा उसके स्थान पर स्थापित किया।
कथा सुनने का महत्व
धार्मिक मान्यता है कि वराह भगवान की कथा सुनने और उनका ध्यान करने से भय दूर होता है तथा जीवन में सकारात्मकता और आत्मविश्वास बढ़ता है। भक्त इस दिन भगवान विष्णु की पूजा कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।
हालांकि मनोकामना पूरी होना आस्था और धार्मिक विश्वास का विषय है। वराह जयंती पर सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही माना जाता है कि अहंकार और अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः धर्म की विजय होती है।

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