नियम चाहिए दूसरों के लिए, आजादी चाहिए अपने लिए—क्या यही बन गया है हमारा नागरिक चरित्र?
प्रणव बजाज
शहर गंदा है तो सरकार दोषी। सड़क टूटी है तो प्रशासन दोषी। यातायात जाम है तो पुलिस दोषी। अतिक्रमण है तो नगर निगम दोषी। लेकिन जरा आईना अपने सामने रखिए—इन समस्याओं को पैदा करने में हमारी भूमिका कितनी है?
हम सुविधा चाहते हैं, मगर जिम्मेदारी नहीं। सड़क चाहिए साफ, लेकिन कचरा फेंकने के लिए डस्टबिन तक चलकर जाना मंजूर नहीं। फुटपाथ चाहिए पैदल चलने के लिए, मगर दुकान बढ़ाने के लिए उसी पर कब्जा करने में कोई हिचक नहीं। यातायात व्यवस्था चाहिए अनुशासित, लेकिन लाल बत्ती पर रुकना समय की बर्बादी लगता है।
यह कैसी मानसिकता है?
हम कानून को तब तक अच्छा मानते हैं, जब तक वह किसी दूसरे पर लागू हो। अपने ऊपर आते ही वही कानून हमें ‘अनावश्यक रोक’ दिखाई देने लगता है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि अनुशासन अब डर से जुड़ गया है, संस्कार से नहीं। पुलिस दिखी तो हेलमेट पहन लिया, कैमरा दिखा तो सीट बेल्ट लगा ली, चालान का डर हुआ तो नियम याद आ गए। यानी कानून का सम्मान नहीं, सिर्फ पकड़े जाने का डर बचा है।
लेकिन दोष केवल नागरिक का भी नहीं है। जब नियम तोड़ने वाले रसूखदार बच निकलते हैं और सामान्य नागरिक पर कानून का डंडा चलता है, तब व्यवस्था खुद नागरिकों को गलत संदेश देती है। कानून की विश्वसनीयता तभी बचेगी, जब वह कमजोर और ताकतवर दोनों के लिए बराबर होगा।
सुविधाएं सरकार की जिम्मेदारी हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में अनुशासन नागरिक की जिम्मेदारी है। दोनों में से एक भी पक्ष पीछे हटा तो शहर नहीं, पूरा सामाजिक ढांचा बिगड़ता है।
हमें तय करना होगा—हम नागरिक हैं या केवल सुविधा के उपभोक्ता?
क्योंकि सड़क पर कूड़ा फेंकने वाला, नियम तोड़कर आगे निकलने वाला और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाला जब व्यवस्था को गाली देता है, तो वह भूल जाता है कि व्यवस्था कोई बाहर की चीज नहीं है—हम सब मिलकर ही व्यवस्था बनाते हैं।
अब सवाल प्रशासन से भी है और नागरिक से भी—
क्या नियम सिर्फ किताबों में रहेंगे?
क्या अनुशासन सिर्फ भाषणों में बचेगा?
और क्या सुविधा के नाम पर नागरिक जिम्मेदारी की हत्या जारी रहेगी?
अगर जवाब हां है, तो फिर हमें बेहतर शहर की मांग करने का नैतिक अधिकार भी खो देना चाहिए।
शहर सरकारें बनाती हैं, लेकिन सभ्य शहर नागरिक बनाते हैं।

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