भोपाल। कर्नल सोफिया कुरैशी से जुड़े विवाद में मध्य प्रदेश सरकार ने तत्कालीन मंत्री विजय शाह के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति नहीं दी है। सरकार के इस फैसले ने कानूनी प्रक्रिया के साथ-साथ सियासी बहस भी तेज कर दी है। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां राज्यपाल की भूमिका भी सामने आई। अब कैबिनेट के फैसले पर राज्यपाल की मंजूरी के बाद सरकार के रुख को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है।
कांग्रेस का आरोप है कि सरकार विजय शाह को राजनीतिक संरक्षण दे रही है। विपक्ष का सवाल है कि यदि किसी मंत्री के बयान को लेकर इतना गंभीर विवाद पैदा हुआ और मामला न्यायिक स्तर तक पहुंचा, तो सरकार अभियोजन की अनुमति देने से पीछे क्यों हट रही है? क्या सरकार को डर है कि कार्रवाई हुई तो भाजपा के भीतर राजनीतिक नुकसान होगा?
दूसरी ओर भाजपा के सामने भी एक राजनीतिक चुनौती है। विजय शाह के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति देना कांग्रेस को सरकार पर हमला करने का बड़ा हथियार दे सकता है। भाजपा के लिए यह संदेश भी महत्वपूर्ण है कि वह अपने ही वरिष्ठ नेता को विपक्ष के दबाव में कार्रवाई के लिए नहीं छोड़ रही। यही वजह है कि पूरे घटनाक्रम को केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि सियासी संतुलन की कवायद के तौर पर भी देखा जा रहा है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार का फैसला कानूनी तथ्यों पर आधारित है या राजनीतिक मजबूरी पर? यदि सरकार के पास अभियोजन रोकने के ठोस आधार हैं तो उन्हें सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं किया जाता?
अब गेंद भले ही संवैधानिक प्रक्रिया में आगे बढ़ गई हो, लेकिन विजय शाह प्रकरण ने मोहन यादव सरकार के सामने जवाबदेही और राजनीतिक संरक्षण के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

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