पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर में टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा के खिलाफ हुए प्रदर्शन ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को सड़क पर ला दिया है। चापड़ा में पार्टी बैठक के बाद लौट रहीं मोइत्रा की गाड़ी को प्रदर्शनकारियों ने घेरा, काले झंडे दिखाए और ‘गो बैक’ के नारे लगाए। सवाल यह है कि अगर यह सिर्फ राजनीतिक विरोध था, तो प्रदर्शन इतना उग्र क्यों हुआ और सांसद के दौरे के दौरान सुरक्षा व्यवस्था कहां थी?
महुआ मोइत्रा ने इसके लिए बागी टीएमसी विधायक जाबेर शेख और बीजेपी पर आरोप लगाया है। लेकिन आरोपों से बड़ा सवाल स्थानीय राजनीति का है। आखिर सांसद के खिलाफ उनके ही संसदीय क्षेत्र में इस तरह का गुस्सा क्यों दिखाई दे रहा है?
टीएमसी के भीतर पहले से चल रही गुटबाजी के बीच यह घटना पार्टी नेतृत्व के लिए भी असहज करने वाली है। एक तरफ पार्टी बाहरी विपक्ष से मुकाबले का दावा करती है, दूसरी तरफ उसके नेताओं को अपने ही इलाके में विरोध झेलना पड़ रहा है।
अब जांच का मुद्दा सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि नारे किसने लगाए। असली सवाल यह है कि विरोध की जमीन तैयार कैसे हुई? क्या पार्टी संगठन स्थानीय स्तर पर कमजोर पड़ रहा है, या फिर अंदरूनी सत्ता संघर्ष अब खुलकर सामने आ चुका है?
कृष्णानगर की सड़क पर लगे ‘गो बैक’ के नारे फिलहाल सिर्फ महुआ मोइत्रा के खिलाफ प्रदर्शन नहीं दिखते—वे टीएमसी की अंदरूनी बेचैनी का भी संकेत दे रहे हैं।

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