मिसाइलों की गिनती बढ़ती गई, भरोसे की गिनती कौन करेगा? युद्ध रोकने का बजट आखिर किस मंत्रालय के पास है?
संपादकीय | प्रणव बजाज
दुनिया का हिसाब बड़ा दिलचस्प है। हर देश को अपनी सुरक्षा की चिंता है, इसलिए रक्षा मंत्रालय है, सेना है, मिसाइल है, टैंक है, ड्रोन है और हथियारों का लगातार अपग्रेड भी है। लेकिन शांति? उसके लिए मंत्रालय खोजने निकलें तो लगता है जैसे सरकारी फाइल में ही रास्ता भटक गई हो।
SIPRI के ताजा आंकड़े बताते हैं कि 2025 में दुनिया ने सैन्य तैयारियों पर रिकॉर्ड 2,887 अरब डॉलर खर्च किए। यह लगातार 11वां साल है जब वैश्विक सैन्य खर्च बढ़ा। भारत भी 92.1 अरब डॉलर के सैन्य खर्च के साथ दुनिया के पांच बड़े सैन्य खर्च करने वाले देशों में रहा।
अब जरा व्यंग्य समझिए—युद्ध की तैयारी के लिए मंत्रालय, युद्ध लड़ने के लिए सेना, हथियार खरीदने के लिए बजट और युद्ध के बाद शांति वार्ता के लिए बैठक। लेकिन युद्ध रोकने के लिए स्थायी सरकारी ढांचा?
गांधी का देश होने के नाते भारत के सामने यहां एक दिलचस्प सवाल खड़ा होता है। क्या शांति केवल भाषणों, सम्मेलनों और ‘विश्व बंधुत्व’ के नारों का विषय रहेगी? क्यों न संघर्ष-समाधान, मध्यस्थता, शांति शिक्षा, सामुदायिक संवाद और अहिंसक समाधान के लिए एक संस्थागत व्यवस्था पर गंभीर बहस हो?
इसका मतलब रक्षा व्यवस्था कमजोर करना नहीं है। सीमा की सुरक्षा अपनी जगह जरूरी है। सवाल सिर्फ इतना है कि सुरक्षा की परिभाषा में संवाद को कितनी जगह मिली?
दुनिया हथियारों पर खरबों डॉलर खर्च कर रही है। SIPRI भी बढ़ते सैन्य खर्च के बीच मानव-केंद्रित सुरक्षा और विकास की प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार की जरूरत रेखांकित कर चुका है।
तो फिर एक प्रयोग क्यों नहीं?
‘रक्षा मंत्रालय’ के सामने ‘शांति मंत्रालय’ भी हो।
एक के पास सवाल हो—खतरा आए तो क्या करेंगे?
दूसरे के पास सवाल हो—खतरा पैदा ही न हो, इसके लिए क्या करेंगे?
क्योंकि मिसाइल युद्ध जीत सकती है, लेकिन हमेशा शांति नहीं बना सकती। टैंक सीमा सुरक्षित कर सकते हैं, लेकिन समाज के भीतर पैदा अविश्वास का इलाज नहीं कर सकते।
शायद अब दुनिया को सिर्फ हथियारों की दौड़ में आगे निकलने का नहीं, शांति की संस्थागत तैयारी में भी आगे बढ़ने का साहस दिखाना चाहिए।
वरना इतिहास हमें फिर वही सवाल पूछेगा—युद्ध के लिए इतना इंतजाम था, शांति के लिए क्या था?

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