नई दिल्ली। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुआ मक्का संयुक्त रक्षा समझौता अब सिर्फ कागज पर नहीं है। 31 अगस्त को इस्तांबुल में तीनों देशों की पहली रणनीतिक राजनीतिक एवं रक्षा समिति की बैठक हुई, जिसमें इस गठजोड़ को संस्थागत रूप देने की दिशा में अहम फैसले लिए गए।
इस समझौते की सबसे बड़ी शर्त है—तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला बाकी दोनों पर हमला माना जाएगा। यही प्रावधान इसे अक्सर ‘इस्लामिक नाटो’ कहे जाने की वजह बना रहा है। हालांकि विशेषज्ञों के मुताबिक इसे अभी नाटो जैसा पूर्ण सैन्य गठबंधन कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि इसके पास नाटो जैसी स्थायी संयुक्त सेना और एकीकृत सैन्य कमान नहीं है।
सऊदी अरब में बनेगा मुख्य दफ्तर
तीनों देशों ने अब समझौते के तहत सऊदी अरब में स्थायी सचिवालय बनाने पर सहमति जताई है। यह सचिवालय रक्षा सहयोग और गठबंधन की गतिविधियों के समन्वय का केंद्र होगा। खास बात यह है कि शुरुआती तीन साल के लिए इसका नेतृत्व पाकिस्तान के एक महासचिव के हाथ में रहेगा।
पाकिस्तान की भूमिका क्यों अहम?
पाकिस्तान परमाणु शक्ति है और उसकी सेना को इस गठजोड़ में महत्वपूर्ण सैन्य भूमिका मिल सकती है। वहीं तुर्किये रक्षा उद्योग और सैन्य तकनीक में मजबूत है, जबकि सऊदी अरब के पास बड़ी आर्थिक क्षमता है। तीनों की ताकत मिलकर रक्षा उत्पादन, सैन्य अभ्यास, तकनीकी सहयोग और संयुक्त क्षमताओं को बढ़ाने का आधार बन सकती है।
बैठक में सैन्य बलों के बीच बेहतर तालमेल, संयुक्त अभ्यास, रक्षा उद्योग में सहयोग, संयुक्त उत्पादन और नई सैन्य तकनीक विकसित करने पर भी जोर दिया गया।
क्या यह नाटो जैसा होगा?
अभी नहीं। इसे ‘इस्लामिक नाटो’ कहना राजनीतिक और मीडिया की उपमा ज्यादा है। असली परीक्षा तब होगी जब तीनों में से किसी एक पर हमला होता है और यह तय करना पड़ता है कि बाकी दो देश किस स्तर की सैन्य मदद देंगे। समझौते में सामूहिक रक्षा का सिद्धांत स्पष्ट है, लेकिन उसके संचालन की पूरी सैन्य व्यवस्था अभी विकसित होनी बाकी है।
यानी फिलहाल दफ्तर सऊदी में, शुरुआती नेतृत्व पाकिस्तान के पास और रक्षा तकनीक व सैन्य क्षमता में तुर्किये की बड़ी भूमिका—तीनों की ताकत को जोड़कर एक नया क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा खड़ा करने की कोशिश है।

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