नई दिल्ली। दवाओं के पेटेंट की जांच अब ज्यादा स्पष्ट और एकरूप बनाने की तैयारी है। भारतीय पेटेंट कार्यालय (IPO) ने फार्मास्युटिकल पेटेंट आवेदनों की जांच के लिए नई ड्राफ्ट गाइडलाइन जारी की है। इसका मकसद पेटेंट अधिकारियों की जांच में गुणवत्ता, एकरूपता और निरंतरता बढ़ाना है। खास बात यह है कि इसमें अदालतों के हालिया फैसलों से विकसित कानूनी सिद्धांतों को भी शामिल किया जा रहा है।
मामला इसलिए अहम है क्योंकि किसी दवा पर पेटेंट मिलने से उस आविष्कार को कानूनी संरक्षण मिलता है और प्रतिस्पर्धी कंपनियों के लिए उसी तकनीक या दवा को बाजार में लाना मुश्किल हो सकता है। वहीं, बहुत व्यापक या कमजोर पेटेंट को लेकर सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता और सार्वजनिक हित का सवाल भी उठता है।
नई ड्राफ्ट गाइडलाइन में नवीनता, इन्वेंटिव स्टेप, औद्योगिक उपयोगिता, दावे की स्पष्टता और पर्याप्त खुलासा जैसे प्रमुख पहलुओं की जांच के लिए अदालतों की व्याख्याओं को ध्यान में रखा गया है। खासकर फार्मास्युटिकल पेटेंट में पेटेंट कानून की धारा 3(d) महत्वपूर्ण है, जो पहले से ज्ञात दवा के नए रूप या बदलाव को पेटेंट देने पर अतिरिक्त कसौटी लगाती है।
इसका मतलब क्या होगा? पेटेंट अधिकारी केवल आवेदन में किए गए दावे को नहीं देखेंगे, बल्कि संबंधित कानूनी प्रावधानों की न्यायिक व्याख्या को भी जांच प्रक्रिया में ज्यादा व्यवस्थित तरीके से इस्तेमाल करेंगे। इससे पेटेंट आवेदनों पर निर्णय लेने में एकरूपता आने की उम्मीद है।
हालांकि इसे सीधे तौर पर “दवा पेटेंट पर लगाम” कहना अभी जल्दबाजी होगी। यह फिलहाल ड्राफ्ट गाइडलाइन है और अंतिम रूप दिए जाने से पहले इस पर प्रक्रिया के अनुसार विचार होना है। 4 सितंबर 2026 की ड्राफ्ट गाइडलाइन पर सार्वजनिक टिप्पणियां भी मांगी गई हैं।
यानी सरकार का फोकस एक तरफ दवा कंपनियों के वास्तविक नवाचार को पेटेंट सुरक्षा देना और दूसरी तरफ कमजोर या अनुचित पेटेंट दावों की जांच को ज्यादा मजबूत बनाने पर है। इसका सीधा असर भविष्य में नई दवाओं, जेनेरिक कंपनियों और मरीजों के लिए दवाओं की उपलब्धता पर पड़ सकता है।

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