नए कपड़े, बदलते रुझान और ऑनलाइन खरीदारी ने फैशन को पहले से कहीं ज्यादा तेज बना दिया है। कुछ ही समय में बदल जाने वाले रुझानों के कारण लोग जरूरत से ज्यादा कपड़े खरीद रहे हैं और पुराने कपड़ों को जल्दी इस्तेमाल से बाहर कर देते हैं। इसी बढ़ती खपत ने फास्ट फैशन को पर्यावरण की बड़ी चुनौती बना दिया है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार दुनिया में हर साल करीब 9.2 करोड़ टन कपड़ा कचरा पैदा होता है। इतना ही नहीं, हर सेकंड लगभग एक कचरा-वाहन के बराबर कपड़े कचरे के ढेर में पहुंचते हैं या जला दिए जाते हैं।
समस्या केवल कचरे तक सीमित नहीं है। कपड़ा उद्योग वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में करीब 2 से 8 प्रतिशत का योगदान देता है और भारी मात्रा में पानी की खपत करता है। सिंथेटिक कपड़ों से निकलने वाले सूक्ष्म प्लास्टिक कण भी पर्यावरण और जल स्रोतों के लिए चिंता का विषय हैं।
फास्ट फैशन का कारोबार ऐसे कपड़ों को बढ़ावा देता है जो कम कीमत पर तेजी से बाजार में आते हैं और बदलते रुझानों के साथ जल्दी पुराने माने जाने लगते हैं। नतीजा—कपड़े कम समय पहने जाते हैं और ज्यादा मात्रा में फेंके जाते हैं।
इस समस्या से निपटने का रास्ता केवल पुनर्चक्रण नहीं है। जरूरत है कि कपड़े कम खरीदें, ज्यादा समय तक पहनें, मरम्मत करें, पुराने कपड़े दोबारा इस्तेमाल करें और जरूरत न होने पर उन्हें जिम्मेदारी से दें। फैशन का नया रुझान अगर टिकाऊपन बने, तभी पर्यावरण पर बढ़ता बोझ कम हो सकता है।

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