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80 के दशक में IIT की ‘जाति’ जन्म से नहीं, JEE रैंक से तय होती थी! रमेश श्रीवत्स ने सुनाया कैंपस का पुराना किस्सा



नई दिल्ली। IIT बॉम्बे के छात्र साहिल वाकोडे की मौत के बाद कैंपस में कथित जातिगत भेदभाव को लेकर चल रही बहस के बीच IIT मद्रास के पूर्व छात्र रमेश श्रीवत्स की 1980 के दशक की यादें चर्चा में हैं। श्रीवत्स ने सोशल मीडिया पर साझा वीडियो में उस दौर के IIT कैंपस की अनौपचारिक छात्र-रैंकिंग को व्यंग्यात्मक अंदाज में “कास्ट सिस्टम” बताया। उन्होंने साफ किया कि उनका इशारा जन्म से जुड़ी जाति की ओर नहीं, बल्कि छात्रों के बीच बनती अकादमिक और पेशेवर हैसियत की ओर था।


श्रीवत्स के मुताबिक शुरुआत में JEE रैंक ही छात्र की सामाजिक हैसियत जैसी मानी जाती थी। कुछ समय बाद यह क्रम ब्रांच पर आ गया। उन्होंने उस दौर में कंप्यूटर साइंस को सबसे ऊपर और उसके बाद इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल तथा अन्य शाखाओं का उल्लेख किया। आगे चलकर ब्रांच का प्रभाव कम हुआ और GPA छात्र की पहचान का नया पैमाना बन गया।


उन्होंने GPA के आधार पर भी अलग-अलग अनौपचारिक श्रेणियों का जिक्र किया—कम पढ़कर अच्छे अंक पाने वालों को “जीनियस”, मेहनत करके अच्छे अंक लाने वालों को “कैश काऊ” जैसी श्रेणियों में बताया। चौथे साल तक उनके मुताबिक GPA का महत्व भी कम होने लगा और ध्यान भविष्य के करियर पर चला गया।


यह बयान ऐसे समय आया है जब साहिल वाकोडे की मौत के मामले में उनके परिवार ने जातिगत टिप्पणियों और भेदभाव के आरोप लगाए हैं। IIT बॉम्बे ने इन आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि छात्र ने संस्थान के प्रशासन या SC/ST सेल में ऐसी कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। मामले की जांच जारी है।

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