संपादकीय | प्रणव बजाज
पाकिस्तान ने जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को अपनी 2026 की रेड बुक में भगोड़ा घोषित कर उस पर 70 लाख पाकिस्तानी रुपये का इनाम बढ़ा दिया है। सवाल यह नहीं कि इनाम कितना है, सवाल यह है कि जिस आतंकी को संयुक्त राष्ट्र वैश्विक आतंकवादी घोषित कर चुका है, उसे पाकिस्तान अब तक पकड़ क्यों नहीं पाया?
मसूद अजहर का नाम भारत के संसद हमले, पठानकोट और पुलवामा जैसे बड़े आतंकी मामलों से जुड़ा रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने 2019 में उसे वैश्विक आतंकवादी घोषित किया था। ऐसे व्यक्ति को अचानक ‘भगोड़ा’ बताकर इनाम बढ़ाना आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई कम और अंतरराष्ट्रीय दबाव के जवाब में तैयार किया गया कागजी प्रमाण ज्यादा नजर आता है।
सबसे बड़ा सवाल एफएटीएफ को लेकर है। अक्टूबर की आगामी बैठक से पहले पाकिस्तान का यह कदम संदेह को और गहरा करता है। वह पहले भी एफएटीएफ की ग्रे सूची में रह चुका है। ऐसे में क्या 70 लाख का इनाम आतंक के वित्तपोषण और आतंकी ढांचे पर वास्तविक कार्रवाई का विकल्प बन सकता है? बिल्कुल नहीं।
पाकिस्तान को दुनिया को इनाम की पर्ची नहीं, कार्रवाई का सबूत देना चाहिए। मसूद अजहर अगर सचमुच भगोड़ा है तो उसे खोजिए, गिरफ्तार कीजिए और उसके नेटवर्क, संपत्ति तथा मददगारों पर कार्रवाई कीजिए। वरना यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आतंकी को पकड़ने का नाटक है या उसे बचाने का नया रास्ता?
आतंकवाद से लड़ाई प्रेस विज्ञप्तियों से नहीं होती। पाकिस्तान को अब तय करना होगा—वह आतंक का शिकार होने का ढोंग करेगा या आतंक पालने की अपनी पुरानी नीति से सचमुच तौबा करेगा।

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