मुंबई। महाराष्ट्र में न्याय व्यवस्था के सामने जजों की भारी कमी का आंकड़ा सामने आया है। राज्य के कानून एवं न्याय विभाग की ओर से दाखिल हलफनामे के अनुसार, न्यायिक व्यवस्था में स्वीकृत 5,195 पदों में से केवल 2,116 पद ही भरे गए हैं, जबकि करीब 3,079 पद खाली हैं। यानी लगभग 60 फीसदी न्यायिक पदों पर नियुक्तियां नहीं हुई हैं।
इस स्थिति पर बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने भी चिंता जताई है। न्यायिक पदों की इतनी बड़ी संख्या में रिक्तियां सीधे तौर पर अदालतों के कामकाज, मामलों की सुनवाई और लंबित मुकदमों के निपटारे से जुड़ा गंभीर प्रशासनिक सवाल खड़ा करती हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अदालतों में मामलों का दबाव लगातार बना हुआ है, तब स्वीकृत पदों का बड़ा हिस्सा खाली क्यों है? सरकार के कानून एवं न्याय विभाग के रिकॉर्ड में पदों की संख्या स्पष्ट है, लेकिन इन पदों को भरने की प्रक्रिया कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, यह भी महत्वपूर्ण है।
हलफनामे के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि समस्या केवल अदालतों में लंबित मामलों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायिक ढांचे में मानव संसाधन की कमी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
चीफ जस्टिस की चिंता के बाद अब निगाहें इस बात पर हैं कि महाराष्ट्र सरकार और संबंधित न्यायिक तंत्र रिक्त पदों को भरने के लिए क्या ठोस कदम उठाते हैं। न्याय में देरी का सवाल सिर्फ अदालत का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का सवाल है।

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