भोपाल। मध्यप्रदेश भाजपा में लंबे इंतजार के बाद निगम-मंडल, बोर्ड, प्राधिकरण और आयोगों में राजनीतिक नियुक्तियां तो शुरू हो गईं, लेकिन अब नई बेचैनी पद नहीं, पावर को लेकर बताई जा रही है। पार्टी के भीतर चर्चा है कि जिन नेताओं को जिम्मेदारी मिली है, उनमें कई को अभी तक कैबिनेट मंत्री या राज्यमंत्री का दर्जा नहीं मिला। ऐसे में वर्षों से राजनीतिक नियुक्ति की आस लगाए बैठे नेताओं के सामने सवाल खड़ा है—कुर्सी मिली है या सिर्फ नाम का पद?
मध्यप्रदेश में करीब 48 निगम-मंडल और प्राधिकरण ऐसे हैं, जहां राजनीतिक नियुक्तियां होती रही हैं। 2026 में नियुक्तियों का सिलसिला शुरू होने के बाद सरकार ने सत्ता और संगठन के बीच संतुलन साधने की कोशिश की। लेकिन मंत्री दर्जे को लेकर स्थिति अलग-अलग रही है। मई में ही इस बात को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई थी कि नए अध्यक्षों को मंत्री दर्जा मिलेगा या नहीं।
दिलचस्प यह है कि पिछली सरकारों में निगम-मंडल के अध्यक्षों और उपाध्यक्षों को मंत्री तथा राज्यमंत्री का दर्जा दिए जाने की परंपरा रही है। 2022 में भी बड़ी संख्या में अध्यक्षों को मंत्री और उपाध्यक्षों को राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया था।
यही पुरानी व्यवस्था अब नए नियुक्त नेताओं की बेचैनी की वजह बताई जा रही है। संगठन के लिए वर्षों तक काम करने वाले नेताओं को उम्मीद थी कि राजनीतिक नियुक्ति के साथ उन्हें सरकारी प्रोटोकॉल, अधिकार और प्रशासनिक महत्व भी मिलेगा। लेकिन यदि पद तो मिले और मंत्री का दर्जा नहीं मिला, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकार ने नेताओं को जिम्मेदारी दी है या सिर्फ राजनीतिक संतुलन साधा है?
सबसे दिलचस्प मामला भाजपा के वरिष्ठ नेता जयभान सिंह पवैया का है। उन्हें मार्च 2026 में छठवें राज्य वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। आयोग का कार्यकाल 31 अक्टूबर 2026 तक है। यानी पवैया के मामले में समय भी तेजी से निकल रहा है।
अब भाजपा के भीतर असली चर्चा यह है कि जिन्हें अध्यक्ष बनाया गया है, उन्हें सरकार कब तक वह राजनीतिक वजन देगी जिसकी उम्मीद नियुक्ति के समय की गई थी?
पद की घोषणा से आगे कब बढ़ेगी सरकार?
निगम-मंडल राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए सिर्फ पद नहीं होते। ये संगठन और सरकार के बीच राजनीतिक समन्वय का माध्यम भी माने जाते हैं। ऐसे में अध्यक्षों को अधिकार, प्रोटोकॉल और मंत्री दर्जा नहीं मिलने पर उनकी प्रभावशीलता पर भी सवाल उठता है।
सरकार के सामने अब दो सवाल हैं—
क्या मंत्री दर्जा देने की कोई स्पष्ट नीति है?
और दूसरा—अगर दर्जा देना ही नहीं था तो इतने लंबे इंतजार के बाद नेताओं को नियुक्तियां देने में इतनी जल्दबाजी क्यों की गई?
भाजपा के भीतर नाराजगी की चर्चाएं अगर सही हैं तो यह सिर्फ कुछ नेताओं की व्यक्तिगत नाराजगी नहीं, बल्कि सत्ता और संगठन के बीच अपेक्षाओं के अंतर का संकेत भी हो सकती हैं।
मोहन सरकार के लिए चुनौती अब नियुक्तियां करने की नहीं, बल्कि उन नियुक्त नेताओं को यह भरोसा दिलाने की है कि उन्हें सिर्फ पद नहीं मिला है, सरकार में उनकी भूमिका भी है।

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