जबलपुर। सरकारी स्कूलों में शिक्षा के लिए बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जबलपुर के नकटिया गांव की तस्वीर उन दावों की हकीकत पर सवाल खड़े करती है। यहां करीब चार साल पहले जर्जर स्कूल भवन को गिरा दिया गया, लेकिन उसके बाद नया भवन अब तक तैयार नहीं हो सका। नतीजा यह है कि 48 नौनिहाल कभी बरगद के पेड़ के नीचे तो कभी आंगनबाड़ी के छोटे से कमरे में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
बारिश हो, तेज धूप हो या सर्दी—बच्चों की कक्षा का ठिकाना मौसम के साथ बदल जाता है। जिस उम्र में बच्चों को सुरक्षित कमरा, ब्लैकबोर्ड, पर्याप्त जगह और पढ़ाई का वातावरण मिलना चाहिए, वहां उन्हें खुले आसमान के नीचे शिक्षा लेने की मजबूरी झेलनी पड़ रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर पुराना भवन खतरनाक था और उसे हटाना जरूरी था, तो चार साल में नया भवन क्यों नहीं बन पाया? निर्माण के लिए बजट स्वीकृत हुआ या नहीं? हुआ तो राशि कहां खर्च हुई? जमीन, टेंडर या निर्माण एजेंसी के स्तर पर मामला अटका है तो जिम्मेदार कौन है?
सरकार स्कूलों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा और आधुनिक सुविधाओं की बात करती है, लेकिन नकटिया के 48 बच्चों के सामने फिलहाल सवाल सिर्फ इतना है—उन्हें पढ़ने के लिए चार दीवारें आखिर कब मिलेंगी?
यह सिर्फ एक भवन का मामला नहीं, बल्कि उन बच्चों के भविष्य का सवाल है जिनकी शिक्षा व्यवस्था की लापरवाही के बीच चल रही है।

Post a Comment