उज्जैन | विशेष रिपोर्ट | प्रणव बजाज
सिंहस्थ 2028 के नाम पर उज्जैन में विकास की रफ्तार बढ़ी है, लेकिन बिजली लाइन शिफ्टिंग के काम ने सरकारी निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि नई सामग्री के नाम पर कई स्थानों पर पुराने पोल, केबल और उपकरण दोबारा लगाए गए और कुछ पुराने पोलों पर सिर्फ सिल्वर पेंट कर उन्हें नया दिखाने की कोशिश हुई। सबसे बड़ा सवाल उन करीब 40 ट्रांसफॉर्मरों के रिकॉर्ड को लेकर उठ रहा है, जिनकी जानकारी उपलब्ध नहीं होने का दावा किया जा रहा है।
सरकारी ई-टेंडर रिकॉर्ड यह जरूर दिखाता है कि सिंहस्थ के लिए उज्जैन में बिजली व्यवस्था मजबूत करने के नाम पर लगातार नए काम निकाले जा रहे हैं—कहीं 33 KV लाइन, कहीं अतिरिक्त DTR, कहीं ट्रांसफॉर्मर की क्षमता 200 से 315 KVA और कहीं 5 MVA से 10 MVA तक बढ़ाने के काम।
ऐसे में असली सवाल ₹250 करोड़ के बताए जा रहे लाइन-शिफ्टिंग बजट से भी आगे जाता है—पुरानी सामग्री हटाई गई तो वह गई कहां? स्टोर में जमा हुई तो उसका स्टॉक रजिस्टर क्या कहता है? GIS सर्वे हुआ तो उसकी रिपोर्ट कहां है? कितने पोल नए खरीदे गए और कितने पुराने लगाए गए? किस फर्म को भुगतान हुआ और मौके पर काम किसने किया?
यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि विधानसभा में सरकार पहले बता चुकी है कि बिजली लाइन और ट्रांसफॉर्मर शिफ्टिंग के कार्यों में भौतिक सत्यापन तथा सामग्री की गुणवत्ता की जांच की जाती है।
अब उज्जैन में सरकार को कागज नहीं, पोल गिनकर जवाब देना होगा। सिंहस्थ आस्था का महापर्व है; इसकी बिजली व्यवस्था में एक-एक पोल, केबल और ट्रांसफॉर्मर का हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए।
सरकार बताए—पुराना सामान कहां गया, नया कितना आया और भुगतान किस आधार पर हुआ?

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