नई दिल्ली। करीब 35 साल से अदालतों में उलझे एक पुराने बैंक लोन घोटाले के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। मामला वर्ष 1991 का था और लंबे समय तक मुकदमे के चलते इसके दो आरोपी इस दुनिया से चले गए। अब मामले के खत्म होने के बाद उनके परिवारों को करीब 3 करोड़ रुपये की रकम मिलने का रास्ता साफ हो सकता है।
इस मामले में आरोपियों पर बैंक से जुड़े ऋण लेन-देन में अनियमितताओं के आरोप लगाए गए थे। लेकिन करीब साढ़े तीन दशक तक चली कानूनी प्रक्रिया के दौरान मामला अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सका। इस बीच दो आरोपियों की मृत्यु हो गई। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की लंबी अवधि और उससे जुड़े कानूनी पहलुओं पर विचार करते हुए कार्यवाही को समाप्त कर दिया।
मामले का सबसे दिलचस्प पहलू आर्थिक मुआवजे से जुड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, दो मृत आरोपियों के परिवारों को करीब 3 करोड़ रुपये मिलने की संभावना है। यह रकम उस धनराशि से जुड़ी है जो लंबे समय से न्यायिक प्रक्रिया के कारण अटकी हुई थी। करीब 15 वर्षों से जमा रकम पर चक्रवृद्धि ब्याज जुड़ने के कारण अंतिम भुगतान इससे भी अधिक हो सकता है।
यह फैसला केवल एक पुराने बैंक मामले के अंत तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी खड़ा करता है कि दशकों तक चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया का बोझ आखिर किस पर पड़ता है? आरोपी की मृत्यु के बाद भी मुकदमा चलता रहे और परिवार वर्षों तक कानूनी अनिश्चितता में रहे, तो न्याय व्यवस्था की गति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय लंबे समय से लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे की जरूरत को एक बार फिर रेखांकित करता है।

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