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मासूमों को कैंसर और पल-पल टूटता परिवार, इलाज के लिए हर साल शहर जाते हैं 32 हजार परिवार

 

नई दिल्ली । बौद्धिक प्रतिकार


बच्चे को कैंसर हो तो बीमारी सिर्फ मासूम के शरीर तक सीमित नहीं रहती, पूरा परिवार उसके साथ लड़ाई लड़ता है। देश में हर साल 32 हजार से अधिक परिवार बच्चों के कैंसर का इलाज कराने बड़े शहरों का रुख करते हैं। इलाज की लंबी प्रक्रिया, लगातार अस्पताल के चक्कर और बढ़ते खर्च के बीच परिवारों के सामने एक और बड़ी चुनौती सुरक्षित और साफ रहने की होती है।



कैंसर का इलाज कई बार हफ्तों या महीनों तक चलता है। दूर-दराज के गांवों और छोटे शहरों से आने वाले परिवारों को अस्पताल के आसपास रहने के लिए जगह तलाशनी पड़ती है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए महंगा होटल या किराये का कमरा लंबे समय तक लेना आसान नहीं होता। ऐसे में कई परिवार अस्पताल के आसपास बेहद सीमित सुविधाओं में रहने को मजबूर हो जाते हैं।


बच्चे के इलाज के साथ माता-पिता को भोजन, दवाइयों, जांच और आने-जाने का खर्च भी उठाना पड़ता है। कई परिवारों के लिए इलाज के दौरान रोजी-रोटी चलाना भी चुनौती बन जाता है। बच्चे की देखभाल के कारण माता-पिता में से किसी एक को काम छोड़ना पड़ सकता है।


यह स्थिति केवल चिकित्सा व्यवस्था का सवाल नहीं है। कैंसर से जूझ रहे बच्चों के परिवारों के लिए इलाज के साथ सुरक्षित आवास, भोजन और आर्थिक सहायता भी जरूरी है। सवाल है कि बड़े कैंसर अस्पतालों के आसपास ऐसे परिवारों के लिए पर्याप्त सस्ती और स्वच्छ आवास व्यवस्था क्यों नहीं विकसित की गई?


32 हजार से ज्यादा परिवारों की यह यात्रा बताती है कि कैंसर का इलाज अस्पताल की चारदीवारी से बाहर भी एक बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती है।

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