नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में युद्ध और समुद्री मार्गों पर बढ़ते खतरे के बावजूद भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बड़ा रणनीतिक कदम उठाया है। पिछले छह महीनों के दौरान भारत ने कच्चे तेल की खरीद के लिए 31 देशों से संपर्क और आपूर्ति व्यवस्था बनाई, जिससे तेल आपूर्ति में बड़ी रुकावट नहीं आने दी गई।
हालांकि आपूर्तिकर्ताओं की संख्या बढ़ाने के बावजूद भारत की निर्भरता रूस पर और मजबूत हुई है। मार्च से अगस्त के दौरान भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 29 प्रतिशत से बढ़कर 47 प्रतिशत पहुंच गई। रूस से आयात लगभग 22.5 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया।
सबसे बड़ा बदलाव इराक से आने वाले तेल में देखने को मिला। इराक की हिस्सेदारी 18 प्रतिशत से घटकर करीब 2 प्रतिशत रह गई, जबकि अमेरिका और नाइजीरिया शीर्ष पांच आपूर्तिकर्ताओं की सूची से बाहर हुए। उनकी जगह वेनेजुएला और ब्राजील ने ली।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। नए देशों से आपूर्ति शुरू होने के बावजूद भारत का तेल आयात अभी भी कुछ प्रमुख देशों के आसपास केंद्रित है। शीर्ष पांच देशों की हिस्सेदारी कुल आयात में 76 प्रतिशत बनी हुई है। यानी भारत ने रास्ते तो बढ़ाए हैं, लेकिन तेल सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती अब भी यही है—युद्ध लंबा चला तो क्या रूस समेत प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं से निर्भरता बनाए रखना आसान रहेगा?
पश्चिम एशिया में तनाव के कारण वैश्विक तेल बाजार में कीमतों और आपूर्ति को लेकर चिंता लगातार बनी हुई है।

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