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बालाघाट में 27 मासूमों की मौत! एक बिस्तर पर 3-4 बच्चे—मोहन सरकार आखिर कर क्या रही है?


मलेरिया, डायरिया, बुखार और दूसरी बीमारियों का कहर; आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था की खुली पोल

प्रणव बजाज

बालाघाट। मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल बालाघाट में बच्चों की बीमारी अब महज स्वास्थ्य संकट नहीं, सरकारी व्यवस्था की परीक्षा बन चुकी है। जून के अंतिम सप्ताह से अब तक करीब 27 बच्चों की मौत का दावा सामने आया है। प्रभावित इलाकों में बुखार, मलेरिया, उल्टी-दस्त, डायरिया, खसरा और अन्य संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं। जिला अस्पताल में मरीजों का दबाव इतना बढ़ा कि एक बिस्तर पर तीन-चार बच्चों के इलाज की तस्वीर सामने आई। 



सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि प्रभावित गांवों में साफ पानी, पोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं। कुछ परिवारों को बच्चों को इलाज के लिए 100 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लेकर जाना पड़ रहा है। प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य दल भेजने और अस्थायी उपचार केंद्र बनाने की कार्रवाई की है, लेकिन सवाल यह है कि मौतों का सिलसिला शुरू होने के बाद व्यवस्था क्यों जागती है? 


हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले डेढ़ महीने में बैगा बहुल गांवों से करीब 400 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत आई है। 


सबसे बड़ा सवाल—मोहन सरकार की जवाबदेही कहां है?


मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार विकास और जनकल्याण के बड़े-बड़े दावे करती है। लेकिन बालाघाट के दूरदराज आदिवासी गांवों में अगर बच्चे बीमारी से जूझ रहे हैं, परिवार पानी और इलाज के लिए भटक रहे हैं और अस्पताल में एक बिस्तर पर कई बच्चों को रखना पड़ रहा है, तो सरकारी योजनाओं का लाभ आखिर किसके लिए है?


यह समय बयान देने का नहीं, जवाब देने का है।


27 बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन? दूषित पानी की जांच कहां है? कुपोषण का सर्वे क्यों नहीं हुआ? गांवों में चिकित्सकीय निगरानी पहले क्यों नहीं पहुंची? और क्या किसी अधिकारी की जवाबदेही तय होगी?


मोहन सरकार को बताना होगा—आदिवासी बच्चे सरकारी आंकड़े हैं या इस प्रदेश के नागरिक?


क्योंकि **जिस सरकार में एक बच्चे की मौत भी व्यवस्था को हिला देनी चाहिए, वहां 27 मौतों के बाद भी अगर सवाल पूछने पड़ें, तो समस्या बीमारी से कहीं बड़ी है।**

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