1993 मुंबई ब्लास्ट के दोषी की समयपूर्व रिहाई की मांग खारिज, पुर्तगाल प्रत्यर्पण समझौते की 25 साल की शर्त नवंबर 2030 में होगी पूरी
नई दिल्ली। 1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे गैंगस्टर अबू सलेम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने गुरुवार को उसकी समयपूर्व रिहाई की याचिका खारिज कर दी और बॉम्बे हाई कोर्ट के अप्रैल 2026 के फैसले को बरकरार रखा।
सलेम ने दलील दी थी कि पुर्तगाल से भारत प्रत्यर्पण के दौरान दी गई संप्रभु आश्वासन की शर्त के तहत उस पर 25 साल से ज्यादा की कैद नहीं हो सकती। उसने जेल में बिताई अवधि और मिली रिमिशन को आधार बनाकर समय से पहले रिहाई की मांग की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसकी मांग स्वीकार नहीं की।
अबू सलेम को 11 नवंबर 2005 को पुर्तगाल से भारत प्रत्यर्पित किया गया था। 2017 में विशेष TADA अदालत ने उसे 1993 मुंबई धमाकों के मामले में उम्रकैद सुनाई थी। इससे पहले 2015 में मुंबई के बिल्डर प्रदीप जैन हत्याकांड में भी उसे उम्रकैद की सजा मिली थी।
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में कहा था कि भारत सरकार को पुर्तगाल को दिए गए आश्वासन का सम्मान करते हुए 25 वर्ष पूरे होने पर रिमिशन के सवाल पर राष्ट्रपति को सलाह देनी होगी। लेकिन अदालत ने खुद उसकी सजा कम करने या तत्काल रिहाई का आदेश नहीं दिया था।
अब अदालत के ताजा फैसले के बाद नवंबर 2030 से पहले उसकी रिहाई का दावा स्वीकार नहीं हुआ है। यानी फिलहाल उम्रकैद की सजा जारी रहेगी और प्रत्यर्पण समझौते से जुड़ी 25 साल की अवधि भी अपनी निर्धारित तारीख पर ही पूरी होगी।
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