नई दिल्ली। प्रदूषण और जहरीले स्मॉग के लिए लगातार चर्चा में रहने वाली राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली ने स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026 में पिछले साल के मुकाबले बड़ी छलांग लगाई है। दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की श्रेणी में दिल्ली 172 अंक के साथ 21वें स्थान पर रही। पिछले वर्ष दिल्ली 32वें स्थान पर थी। इस बार उसने मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े महानगरों को पीछे छोड़ दिया।
मुंबई 160.8 अंक के साथ 28वें, जबकि बेंगलुरु 152.6 अंक के साथ 32वें स्थान पर रहा। श्रीनगर 26वें और चेन्नई 35वें स्थान पर रहे। हैदराबाद 19वें स्थान के साथ दिल्ली से आगे रहा।
लेकिन यहां एक बड़ा सवाल भी है—क्या बेहतर रैंकिंग का मतलब दिल्ली की हवा वास्तव में साफ हो गई है? जवाब है, जरूरी नहीं।
स्वच्छ वायु सर्वेक्षण केवल उस समय की हवा या वायु गुणवत्ता सूचकांक को नहीं मापता। इसमें सड़क की धूल पर नियंत्रण, ठोस कचरा प्रबंधन, वाहनों और उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषण पर कार्रवाई, निर्माण मलबे का प्रबंधन तथा जन-जागरूकता जैसे उपायों और उनके क्रियान्वयन का भी मूल्यांकन किया जाता है।
यही वजह है कि ऐसी रैंकिंग में दिल्ली आगे आ सकती है, जबकि सर्दियों में उसका वायु गुणवत्ता सूचकांक गंभीर स्तर तक पहुंचता रहा है। सर्वेक्षण के अनुसार देश के 130 शहरों में 108 शहरों के पीएम-10 स्तर में आधार वर्ष 2017-18 की तुलना में सुधार दर्ज हुआ, लेकिन केवल 14 शहर राष्ट्रीय मानक तक पहुंच सके।
लखनऊ नंबर-1, इंदौर दूसरे स्थान पर
दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में लखनऊ 198 अंक के साथ पहले, इंदौर 197 अंक के साथ दूसरे और जबलपुर 195 अंक के साथ तीसरे स्थान पर रहा। भोपाल और आगरा 192-192 अंकों के साथ संयुक्त रूप से चौथे स्थान पर रहे।
इस बार की रैंकिंग का सबसे बड़ा संदेश यही है—कागज पर प्रदूषण नियंत्रण की कोशिशों में सुधार हुआ है, लेकिन महानगरों की वास्तविक हवा अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है।
दिल्ली की रैंकिंग सुधरी है, लेकिन दिल्लीवासियों का असली सवाल रैंकिंग नहीं, सांस लेने लायक हवा है।

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