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2023 से 2026 तक मनीष सिंह की ‘कुर्सी यात्रा’: जनसंपर्क से वित्त, फिर परिवहन और वापस जनसंपर्क!

चार साल, कई अहम प्रभार और परिवहन की कुर्सी से जुड़ा हाईकोर्ट विवाद—रिकॉर्ड पूछता है, सरकार का भरोसा बार-बार एक ही अधिकारी पर क्यों?

विशेष रिपोर्ट | प्रणव बजाज



भोपाल। मध्यप्रदेश की नौकरशाही में किसी अधिकारी की पोस्टिंग सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश नहीं होती। हर तबादले के साथ एक नई जिम्मेदारी, नई फाइलें और नए फैसलों की जवाबदेही जुड़ती है। मनीष सिंह की 2023 से 2026 तक की पोस्टिंग देखें तो उनकी प्रशासनिक यात्रा भी कम दिलचस्प नहीं है।


रिकॉर्ड में एक तरफ पद बदलते दिखाई देते हैं, दूसरी तरफ कुछ समय बाद महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के साथ वापसी भी।


यही इस रिपोर्ट का सवाल है—सरकार किसी अधिकारी को बार-बार महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने के लिए किन मानदंडों को देखती है?


10 मई 2023 — जनसंपर्क की कुर्सी


10 मई 2023 को मनीष सिंह ने आयुक्त जनसंपर्क का पदभार ग्रहण किया था। उस समय उन्हें निवृत्तमान आयुक्त राघवेन्द्र कुमार सिंह ने कार्यभार सौंपा था।


यानी 2023 की शुरुआत में सरकारी संदेश, विज्ञापन और जनसंपर्क व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उनके पास थी।


लेकिन साल खत्म होते-होते कुर्सी बदल गई।


20 दिसंबर 2023 — जनसंपर्क से अपर सचिव


20 दिसंबर 2023 को प्रशासनिक फेरबदल में मनीष सिंह को जनसंपर्क आयुक्त पद से हटाकर मध्यप्रदेश शासन में अपर सचिव बनाया गया। जनसंपर्क की जिम्मेदारी विवेक पोरवाल को दी गई।


पहला सवाल: कुछ ही महीनों में जनसंपर्क की जिम्मेदारी बदलने का प्रशासनिक कारण क्या था?


जनवरी 2024 — वित्त विभाग


जनवरी 2024 के प्रशासनिक फेरबदल में मनीष सिंह को प्रमुख सचिव, वित्त विभाग की जिम्मेदारी दी गई।


यानी अब सरकारी प्रचार से निकलकर वे प्रदेश की वित्तीय प्रशासनिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण पद पर थे।


जनसंपर्क की फाइलें गईं, वित्त की फाइलें आईं।


सरकारी कुर्सी बदली, फाइलों का वजन बढ़ा!


नवंबर 2024 — परिवहन की ओर बड़ा मोड़


नवंबर 2024 के फेरबदल में मनीष सिंह को आयुक्त हाउसिंग बोर्ड के पद से हटाकर अपर सचिव, परिवहन विभाग बनाया गया। साथ ही उन्हें मध्यप्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम के प्रबंध संचालक की जिम्मेदारी दी गई।


यहीं से उनकी प्रशासनिक भूमिका का वह अध्याय शुरू होता है, जो आगे चलकर हाईकोर्ट तक पहुंचा।


एक तरफ परिवहन विभाग, दूसरी तरफ राज्य सड़क परिवहन निगम—एक अधिकारी, दो महत्वपूर्ण परिवहन भूमिकाएं।


मार्च 2025 — STA की अध्यक्षता पर कानूनी सवाल


मार्च 2025 में जारी गजट अधिसूचना के माध्यम से मनीष सिंह को State Transport Authority यानी STA का अध्यक्ष बनाए जाने को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।


याचिकाकर्ता ने यह कानूनी सवाल उठाया कि उस समय सिंह राज्य सड़क परिवहन निगम के MD भी थे। अक्टूबर 2025 में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव और STA अध्यक्ष मनीष सिंह को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।


यहां सावधानी जरूरी है—याचिका में लगाए गए आरोप न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं हैं।


लेकिन सवाल अदालत के रिकॉर्ड में पहुंच चुका था।


अगस्त 2025 — एक और परिवहन संस्था


अदालत में दाखिल मामले की रिपोर्ट के अनुसार अगस्त 2025 में मनीष सिंह को मध्यप्रदेश यात्री परिवहन एवं अधोसंरचना लिमिटेड का प्रबंध संचालक भी बनाया गया। यह संस्था बस संचालन और परिवहन अधोसंरचना से जुड़ी थी।


अब तस्वीर कुछ ऐसी थी—


परिवहन विभाग + राज्य सड़क परिवहन निगम + STA + यात्री परिवहन एवं अधोसंरचना।


यानी परिवहन की फाइलें एक ही प्रशासनिक छत के नीचे लगातार बढ़ती गईं।


9 फरवरी 2026 — STA का पुनर्गठन


राज्य सरकार ने 9 फरवरी 2026 को STA के पुनर्गठन की अधिसूचना जारी की।


लेकिन यह नया ढांचा भी विवाद से बच नहीं सका।


ग्वालियर खंडपीठ ने इस पुनर्गठन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की और जून 2026 में इसके संचालन पर अंतरिम रोक लगा दी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत के सामने प्रक्रिया में कानूनी खामियों की बात स्वीकार करते हुए सुधार के लिए समय मांगा।


यहां सवाल किसी व्यक्ति पर दोष लगाने का नहीं, बल्कि सरकारी प्रक्रिया की गुणवत्ता का है।


फरवरी 2026 — फिर जनसंपर्क!


और अब आता है इस पूरी टाइमलाइन का सबसे दिलचस्प मोड़।


14 फरवरी 2026 को सरकार ने 11 IAS अधिकारियों के तबादले किए और मनीष सिंह को फिर आयुक्त जनसंपर्क बनाया। रिपोर्टों के अनुसार उनके पास परिवहन विभाग और जेल विभाग भी रहे तथा राज्य सड़क परिवहन निगम और इंटर स्टेट ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी का अतिरिक्त प्रभार भी बताया गया।


यानी जिस अधिकारी ने पहले जनसंपर्क संभाला था, वे फिर उसी कुर्सी पर लौटे।


सरकार का भरोसा भी क्या चीज है—कुर्सी बदली, विभाग बदला, समय बदला... लेकिन भरोसा फिर वहीं लौट आया!


जून 2026 — हाईकोर्ट की टिप्पणी


STA से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने फरवरी की पुनर्गठन अधिसूचना पर रोक लगाई। रिपोर्टों के मुताबिक राज्य ने अदालत के समक्ष माना कि अधिसूचना में कुछ कानूनी खामियां थीं और उसे सुधारने के लिए समय मांगा।


यह किसी अधिकारी की व्यक्तिगत दोषसिद्धि नहीं है।


लेकिन प्रशासनिक रिकॉर्ड में यह घटना दर्ज है और इसलिए सरकार से सवाल पूछना पूरी तरह जायज है—


ऐसी अधिसूचना जारी होने से पहले कानूनी परीक्षण किस स्तर पर हुआ था?


अगस्त 2026 — फिर बदली STA की कुर्सी


अगस्त 2026 में सरकार ने STA का फिर पुनर्गठन किया। अब नामित अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव स्तर का अधिकारी अध्यक्ष होगा, जबकि परिवहन आयुक्त सदस्य होंगे।


यानी पांच महीने में व्यवस्था फिर बदल गई।


सरकारी कुर्सी को आखिर सही डिजाइन कौन देगा—विभाग या हाईकोर्ट?


चार साल का रिकॉर्ड, सरकार से आठ सवाल


2023 से 2026 तक के इस घटनाक्रम से किसी अधिकारी को दोषी घोषित नहीं किया जा सकता। लेकिन प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए सरकार से ये सवाल जरूर पूछे जा सकते हैं—


1. मनीष सिंह को 2023 में जनसंपर्क से हटाने का प्रशासनिक कारण क्या था?


2. 2024 में वित्त से परिवहन की ओर जिम्मेदारी बदलने का आधार क्या था?


3. परिवहन विभाग, राज्य सड़क परिवहन निगम और STA जैसी संबंधित संस्थाओं में जिम्मेदारियों का इतना केंद्रीकरण क्यों किया गया?


4. STA की नियुक्ति को चुनौती मिलने के बाद सरकार ने क्या कानूनी समीक्षा की?


5. फरवरी 2026 की STA पुनर्गठन अधिसूचना जारी करने से पहले कानूनी राय ली गई थी या नहीं?


6. यदि ली गई थी तो उसमें क्या सलाह दी गई थी?


7. जून में हाईकोर्ट की रोक के बाद अगस्त में पुनर्गठन करने की जरूरत क्यों पड़ी?


8. 68 IAS पद रिक्त होने के बावजूद महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां बार-बार उन्हीं अधिकारियों को देने की नीति क्या है?


रिकॉर्ड का निष्कर्ष नहीं, रिकॉर्ड का सवाल


मनीष सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार या निजी लाभ का निष्कर्ष केवल पोस्टिंग और अदालत में लंबित/निपटे मामलों के आधार पर नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए आधिकारिक जांच, अभियोजन, विभागीय कार्रवाई या न्यायिक निष्कर्ष जरूरी होगा।


लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछने के लिए दोषसिद्धि का इंतजार भी जरूरी नहीं।


2023—जनसंपर्क।

2024—वित्त।

2024—परिवहन।

2025—STA विवाद।

2026—फिर जनसंपर्क।

2026—STA व्यवस्था पर हाईकोर्ट की रोक और फिर पुनर्गठन।


यह टाइमलाइन खुद एक सवाल है।


मध्यप्रदेश में IAS की 68 कुर्सियां खाली हैं और कुछ कुर्सियों पर जिम्मेदारियां लगातार बढ़ती जा रही हैं—क्या सरकार कभी यह सार्वजनिक करेगी कि ‘किस अधिकारी को कौन-सा प्रभार क्यों’ दिया गया?


क्योंकि प्रशासन में असली ताकत कुर्सी की ऊंचाई नहीं होती।


असली सवाल यह होता है—कुर्सी पर बैठने वाले से हिसाब कौन मांग रहा है?

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