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1200 करोड़ का हिसाब कौन देगा?



पंचायतों में पैसा आया, खर्च हुआ या कागजों में गायब—अब खुलेंगी फाइलें

प्रणव बजाज

भोपाल। मध्य प्रदेश की पंचायतों में विकास के लिए हर साल आने वाली करोड़ों रुपये की राशि अब सरकार के लिए बड़ा वित्तीय सवाल बन गई है। सामने आई जानकारी के अनुसार जिला, जनपद और ग्राम पंचायतों को मिलने वाली राशि में करीब 1200 करोड़ रुपये से अधिक के खर्च का हिसाब और उपयोगिता प्रमाण पत्र कई स्तरों पर लंबित हैं। सबसे गंभीर सवाल यह है कि कई मामलों में विभाग के पास यह स्पष्ट रिकॉर्ड तक नहीं है कि स्वीकृत राशि से काम वास्तव में पूरा हुआ या नहीं।



यह मामला केवल हिसाब-किताब की औपचारिकता नहीं है। 15वें केंद्रीय वित्त आयोग की राशि ग्रामीण स्थानीय निकायों तक पहुंचती है और केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक इसके आवंटन एवं निर्गम का अद्यतन विवरण भी जारी किया है। मध्य प्रदेश के लिए वित्त आयोग की अनुदान राशि की किश्तें मार्च 2026 में जारी हुई हैं।


जिम्मेदारी सबसे ऊपर से शुरू


इस पूरी व्यवस्था की राजनीतिक जिम्मेदारी पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल की है। विभाग की प्रशासनिक जिम्मेदारी वर्तमान में अपर मुख्य सचिव दीपाली रस्तोगी के स्तर पर है। सरकारी गतिविधियों में भी अपर मुख्य सचिव द्वारा जनपद पंचायतों और निर्माण कार्यों की समीक्षा किए जाने की पुष्टि होती है।


वित्तीय अनुशासन के स्तर पर अपर मुख्य सचिव वित्त मनीष रस्तोगी की भूमिका महत्वपूर्ण है। बजट संबंधी बैठकों में वित्त विभाग की ओर से वे वरिष्ठ अधिकारी के रूप में शामिल रहे हैं।


इसके बाद असली जवाबदेही आयुक्त पंचायत, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत, पंचायत सचिव और संबंधित कार्य एजेंसी तक जाती है।


सवाल सिर्फ 1200 करोड़ का नहीं


अगर काम पूरा हुआ है तो उसकी माप पुस्तिका, भुगतान विवरण, कार्य की तस्वीरें, स्थल सत्यापन और उपयोगिता प्रमाण पत्र मौजूद होना चाहिए। यदि राशि खर्च दिखाई गई लेकिन प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकारी पैसा किस आधार पर खर्च माना गया।


विधानसभा में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग से जुड़े सवालों के जवाबों में भी सरकार ने अनेक मामलों में कार्यों की स्थिति, अपूर्ण कार्यों और जिम्मेदार अधिकारियों से संबंधित जानकारी सदन में रखी है।


अब जिलेवार जांच जरूरी


सरकार को तत्काल सार्वजनिक करना चाहिए—


किस जिले को कितनी राशि मिली?

कितनी राशि खर्च हुई?

कितने काम पूरे हुए?

कितने काम अधूरे हैं?

कितने उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित हैं?

किस जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी के कार्यकाल में राशि लंबित हुई?

किस जनपद पंचायत ने हिसाब नहीं दिया?

किस पंचायत सचिव ने प्रमाण पत्र नहीं भेजा?

और कितने मामलों में भौतिक सत्यापन नहीं हुआ?


यह भी जांच का विषय है कि जिन पंचायतों ने पुराने खर्च का हिसाब नहीं दिया, उन्हें आगे राशि किस आधार पर जारी की गई।


अगली किश्त से पहले हिसाब!


पंचायती राज मंत्रालय के दस्तावेज बताते हैं कि वित्त आयोग की निधियों के लिए स्पष्ट संचालन दिशा-निर्देश मौजूद हैं। मंत्रालय ने 2026-27 के लिए पंचायत योजना और वित्त आयोग संबंधी नए निर्देश भी जारी किए हैं।


इसलिए अब केवल अधिकारियों को पत्र भेजना पर्याप्त नहीं होगा। 1200 करोड़ की एक-एक राशि का मिलान बैंक भुगतान से लेकर जमीन पर बने काम तक होना चाहिए।


बड़ा सवाल यही है—अगर काम हुआ तो उसका प्रमाण कहां है और अगर काम नहीं हुआ तो पैसा किसके खाते में गया?


जिम्मेदारी की पहली सूची


राजनीतिक स्तर: प्रहलाद सिंह पटेल — पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री

प्रशासनिक स्तर: दीपाली रस्तोगी — अपर मुख्य सचिव, पंचायत एवं ग्रामीण विकास

वित्तीय निगरानी: मनीष रस्तोगी — अपर मुख्य सचिव, वित्त

जिला स्तर: संबंधित जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी

जनपद स्तर: संबंधित जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी

ग्राम स्तर: पंचायत सचिव एवं संबंधित पंचायत पदाधिकारी/कार्य एजेंसी


लेकिन इनमें से किसी व्यक्ति को 1200 करोड़ की अनियमितता का आरोपी कहना अभी उचित नहीं है। दोष तय करने के लिए जिलेवार लंबित राशि, उपयोगिता प्रमाण पत्र और लेखा अभिलेख सामने आना जरूरी है।


अब सरकार को फाइल नहीं, पूरा हिसाब जनता के सामने रखना होगा।

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