2014 से चल रही शिकायतों पर अब क्राइम ब्रांच की कार्रवाई; 16 खरीदारों की शिकायत पर चार लोगों के खिलाफ केस
प्रणव बजाज
कभी बड़े प्रचार और नामचीन चेहरों के सहारे इंदौर के रियल एस्टेट बाजार में पहचान बनाने वाला पिनाकल अब करीब 10 साल पुराने जमीन विवाद में पुलिस कार्रवाई के घेरे में है। निपानिया स्थित पिनाकल ग्रैंड की 9.30 एकड़ जमीन को लेकर दोहरी बिक्री, मिलते-जुलते नाम वाली कंपनियों के जरिए कथित लेन-देन और खरीदारों से करोड़ों रुपए की बुकिंग राशि लेने के आरोप सामने आए हैं। मामले में क्राइम ब्रांच ने 16 खरीदारों की शिकायत पर संजय अग्रवाल, नीना अग्रवाल, रितु अग्रवाल और गुरनाम सिंह धालीवाल के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक न्यासभंग और साजिश की धाराओं में एफआईआर दर्ज की है।
मामले की खास बात यह है कि शिकायतों का सिलसिला 2014-15 से बताया जा रहा है। खरीदारों का आरोप है कि रकम लेने के बावजूद उन्हें प्लॉट नहीं मिले और पैसा भी वापस नहीं किया गया। प्रशासन ने इस दौरान जांच भी कराई, लेकिन पुलिस कार्रवाई करीब एक दशक बाद हुई।
सितंबर 2022 की तत्कालीन अपर कलेक्टर डॉ. अभय बेडेकर की जांच में मिलते-जुलते नाम वाली कंपनियों के जरिए जमीन खरीदने, प्लॉट बुक करने और बेचने के कथित नेटवर्क का उल्लेख किया गया। रिपोर्ट में आशीष दास और पुष्पेंद्र बढ़ेटा की भूमिका को भी गंभीरता से देखा गया।
इसके बाद अप्रैल 2025 में तत्कालीन अपर कलेक्टर गौरव बेनल की 30 पन्नों की रिपोर्ट में संजय अग्रवाल, आशीष दास और पुष्पेंद्र बढ़ेटा की भूमिकाओं की जांच का उल्लेख करते हुए प्रभावित खरीदारों को प्लॉट अथवा बाजार मूल्य के अनुसार राशि लौटाने की अनुशंसा की गई।
9.30 एकड़ जमीन पर असली सवाल
जांच रिपोर्टों के अनुसार अग्रवाल परिवार की करीब 22 एकड़ जमीन में से 9.30 एकड़ जमीन जेएसएम समूह से जुड़ी संस्थाओं को बेची गई। आरोप है कि जिस जमीन पर पहले ही प्लॉट बुक किए जा चुके थे, उसी हिस्से में बाद में नए सौदे किए गए।
जांच में जेएसएम देवकॉन, जेएसएम इंडिया देवकॉन, श्री जेएसएम देवकॉन, श्री जेएसएम देवकॉन इंडिया समेत छह मिलते-जुलते नाम वाली कंपनियों का उल्लेख सामने आया है।
अब क्राइम ब्रांच के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—एक ही जमीन के कितने सौदे हुए? किस खरीदार से कितनी रकम ली गई? कंपनियों के नाम इतने मिलते-जुलते क्यों रखे गए? प्लॉट बिक्री और विकास अनुमति में किसकी क्या भूमिका थी? और कथित दोहरी बिक्री से आखिर किसे कितना आर्थिक लाभ मिला?
दस साल बाद दर्ज हुई एफआईआर ने पुराने मामले को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। अब निगाहें जांच पर हैं कि पुलिस उन सवालों तक पहुंचती है या नहीं, जिनके जवाब खरीदार करीब एक दशक से मांग रहे हैं।

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