उज्जैन। सिंहस्थ-2028 की तैयारियों के बीच उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण को लेकर करीब 100 साल पुरानी शाही मस्जिद का हिस्सा हटाने का रास्ता साफ होता दिखाई दे रहा है। मस्जिद प्रबंधन को हाईकोर्ट से तत्काल राहत नहीं मिली। प्रशासन का तर्क सड़क चौड़ीकरण और सिंहस्थ की तैयारियों से जुड़ा है, लेकिन इस कार्रवाई ने शहर में विकास बनाम धार्मिक विरासत की बहस फिर तेज कर दी है।
मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि उज्जैन में एक के बाद एक पुराने धार्मिक स्थलों और निर्माणों को सड़क और विकास योजनाओं के दायरे में लाया जा रहा है। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि मंदिर है या मस्जिद। सवाल यह होना चाहिए कि क्या विकास की हर योजना का पहला शिकार शहर की ऐतिहासिक विरासत ही बनेगी?
यदि सड़क चौड़ी करना जरूरी है तो सरकार को यह सार्वजनिक करना चाहिए कि कितने वैकल्पिक नक्शों पर विचार किया गया, धार्मिक स्थल का कितना हिस्सा प्रभावित होगा, पुनर्निर्माण या संरक्षण की क्या योजना है और प्रभावित पक्षों से किस स्तर पर संवाद हुआ।
सिंहस्थ दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में शामिल है। इसकी तैयारियां वर्षों पहले शुरू होना स्वाभाविक है। लेकिन सिंहस्थ की भव्यता ऐसी नहीं हो सकती जिसमें उज्जैन की पुरानी पहचान ही रास्ते से हटा दी जाए।
कल किसी मंदिर, आज मस्जिद और कल किसी पुराने बाजार या मकान की बारी—यदि यही विकास का मॉडल है तो सरकार को जनता के सामने इसकी स्पष्ट नीति रखनी होगी।
उज्जैन को सड़कें चाहिए, लेकिन अपनी आत्मा की कीमत पर नहीं। सिंहस्थ चाहिए, लेकिन विरासत मिटाकर नहीं।
सरकार को अब सिर्फ बुलडोजर और नक्शे नहीं, संवाद, संरक्षण और पारदर्शिता भी दिखानी होगी। यही विकास और मनमानी के बीच की असली रेखा है।
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