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आरएसएस पर अमेरिकी आयोग की सिफारिश से बवाल, जानिए USCIRF का इतिहास और पुराने विवाद

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस को लेकर अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग यानी यूएससीआईआरएफ की ताजा सिफारिश ने भारत-अमेरिका संबंधों में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। आयोग ने आरएसएस से जुड़े लोगों पर लक्षित प्रतिबंध लगाने और संगठन के नेताओं के साथ उच्चस्तरीय मुलाकातों से बचने की सिफारिश की है। यह घटनाक्रम आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के प्रस्तावित अमेरिका दौरे से ठीक पहले सामने आया है।



यूएससीआईआरएफ अमेरिका की एक संघीय सलाहकार संस्था है, जो दुनियाभर में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति पर रिपोर्ट तैयार करती है और अमेरिकी सरकार को नीतिगत सुझाव देती है। भारत को लेकर इसकी रिपोर्टें कई वर्षों से विवादों में रही हैं। आयोग ने 2019 में भारत को लेकर चिंता जताई थी, जबकि उसी वर्ष उसके तत्कालीन अध्यक्ष तेनजिन दोरजी ने भारत को धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में गंभीर श्रेणी में रखने की राय से असहमति जताई थी।


इसके बाद 2020 से आयोग ने भारत को लगातार ‘विशेष चिंता वाले देश’ घोषित करने की सिफारिश की। 2021 और उसके बाद की रिपोर्टों में भी भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति और कथित भेदभाव को लेकर गंभीर टिप्पणियां की गईं। यूएससीआईआरएफ की अपनी वेबसाइट पर भारत से संबंधित रिपोर्टों और कार्यक्रमों का लंबा सिलसिला दर्ज है।


मार्च 2026 की रिपोर्ट में विवाद और बढ़ गया, जब आयोग ने आरएसएस और रॉ से जुड़े लोगों के खिलाफ लक्षित प्रतिबंधों की सिफारिश की। अगस्त में मोहन भागवत के अमेरिका दौरे से पहले आयोग ने इस रुख को फिर दोहराया। भारत के विदेश मंत्रालय ने यूएससीआईआरएफ के रुख को पक्षपातपूर्ण बताते हुए उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं।


अब बड़ा सवाल यह है कि धार्मिक स्वतंत्रता की निगरानी के नाम पर काम करने वाली अमेरिकी संस्था की सिफारिशें भारत की आंतरिक राजनीति और संगठनों तक किस सीमा तक प्रभाव डाल सकती हैं। आरएसएस पर ताजा टिप्पणी ने पुराने विवाद को फिर अंतरराष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।

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