कार्लो लोंबार्डी बोले—विदेशी धन के इस्तेमाल पर सरकार की निगरानी जरूरी, 2010 में कानून हुआ और सख्त
नई दिल्ली। विदेशी फंडिंग को लेकर भारत में चल रही राजनीतिक बहस के बीच भारत-इटली संबंधों के सलाहकार और वरिष्ठ विश्लेषक कार्लो लोंबार्डी ने कहा है कि विदेशी धन पर निगरानी कोई नई व्यवस्था नहीं है। उन्होंने कहा कि विदेशी अंशदान नियमन कानून यानी एफसीआरए की शुरुआत 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में हुई थी। बाद में 2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने इसे नए कानून के रूप में और मजबूत किया।
लोंबार्डी के मुताबिक गैर-सरकारी संगठन सामाजिक और मानवीय क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम करते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे संगठन कभी-कभी विदेश नीति के साधन के रूप में भी इस्तेमाल हो सकते हैं। इसलिए सरकार के लिए यह जानना जरूरी है कि पैसा कौन दे रहा है, किस संस्था को दे रहा है और उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि तकनीक और वित्तीय व्यवस्था के विस्तार ने सीमा पार से धन के हस्तांतरण और प्रभाव डालने की संभावनाओं को पहले की तुलना में आसान बना दिया है। ऐसे में विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है।
एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 को बुधवार को संसद की संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने का फैसला किया गया। विधेयक लोकसभा में 25 मार्च को पेश किया गया था। सरकार का तर्क है कि विदेशी अंशदान की निगरानी का उद्देश्य वैध विदेशी सहायता को रोकना नहीं, बल्कि उसके उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
भारत में एफसीआरए की व्यवस्था का इतिहास 1976 तक जाता है। 2010 में नया कानून आया और इसके बाद 2016, 2018, 2020 तथा अन्य नियमों के जरिए अनुपालन व्यवस्था को और मजबूत किया गया।
लोंबार्डी ने इस बहस को भारत तक सीमित न मानते हुए कहा कि कई पश्चिमी देशों में भी विदेशी धन और विदेशी प्रभाव को लेकर अलग-अलग कानून मौजूद हैं। उनके अनुसार सवाल विदेशी सहायता के विरोध का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि धन जिस उद्देश्य के लिए आया है, उसी उद्देश्य में खर्च हो।

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