दतिया हार के बाद दिल्ली दौड़ ने बढ़ाया सियासी तापमान, क्या भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं?

प्रणव बजाज



दतिया उपचुनाव में भाजपा की करारी हार के बाद मध्यप्रदेश की राजनीति में दिल्ली की मुलाकातों ने नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। दतिया में हार के बाद भाजपा ने जिला संगठन को भंग कर दिया है और अब हार के कारणों की समीक्षा चल रही है। ऐसे में प्रदेश के कई बड़े नेताओं का दिल्ली पहुंचना महज संयोग है या पार्टी के भीतर चल रही खींचतान का संकेत—यह सवाल राजनीतिक गलियारों में तेजी से उठ रहा है।


दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मुलाकात, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा और विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर की मुलाकात तथा कैलाश विजयवर्गीय की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बातचीत को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। मुख्यमंत्री मोहन यादव और ज्योतिरादित्य सिंधिया के भी दिल्ली में पार्टी नेतृत्व से मिलने की चर्चा ने इन अटकलों को और हवा दी है।


दतिया ने खोल दिए संगठन के भीतर के सवाल


दतिया उपचुनाव भाजपा के लिए सिर्फ एक विधानसभा सीट का नुकसान नहीं रहा। चुनाव से पहले ही टिकट को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष सामने आया था। भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा के बजाय आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया था और टिकट घोषणा के बाद मिश्रा समर्थकों की नाराजगी भी सामने आई थी।


पार्टी ने चुनाव जीतने का भरोसा जताया था। कैलाश विजयवर्गीय ने चुनाव से पहले साफ कहा था कि भाजपा उम्मीदवार उतारेगी और जीतेगी भी। लेकिन परिणाम इसके उलट आया। हार के बाद अब संगठन की समीक्षा और जिला इकाई के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई है।


सवाल सिर्फ दतिया का नहीं


दतिया की हार ने भाजपा के भीतर एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—क्या संगठन और सत्ता के बीच समन्वय उतना मजबूत है, जितना बाहर से दिखाई देता है?


मध्यप्रदेश भाजपा लंबे समय से अपने मजबूत संगठन और बूथ प्रबंधन के लिए जानी जाती रही है। ऐसे में एक मजबूत राजनीतिक गढ़ मानी जाने वाली सीट पर हार के बाद दिल्ली तक समीक्षा और नेताओं की लगातार आवाजाही को सामान्य राजनीतिक गतिविधि मानकर खारिज करना आसान नहीं है।


सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि दिल्ली में हुई इन मुलाकातों में दतिया की हार, प्रदेश संगठन, सरकार के कामकाज और आगामी नगरीय निकाय चुनावों की रणनीति पर कितनी चर्चा हुई?


शाह से सिर्फ कैलाश की मुलाकात क्यों?


राजनीतिक हलकों में सबसे ज्यादा चर्चा कैलाश विजयवर्गीय की अमित शाह से मुलाकात को लेकर है। यदि मुलाकात सामान्य संगठनात्मक कामकाज का हिस्सा थी तो इसका विवरण सामने आना स्वाभाविक है। लेकिन दतिया हार के तत्काल बाद मध्यप्रदेश के कई प्रभावशाली नेताओं की दिल्ली सक्रियता को देखते हुए इसे व्यापक राजनीतिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है।


हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि भाजपा में कोई बड़ा नेतृत्व संकट खड़ा हो गया है। लेकिन इतना जरूर है कि दतिया के नतीजे ने पार्टी के भीतर आत्ममंथन की जरूरत पैदा कर दी है।


शिवराज-तोमर मुलाकात के मायने भी तलाशे जा रहे


प्रधानमंत्री से शिवराज सिंह चौहान की मुलाकात के साथ ही नरेंद्र सिंह तोमर की दिल्ली सक्रियता पर भी नजर है। दोनों नेता मध्यप्रदेश भाजपा की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली भूमिका रखते रहे हैं।


राजनीति में मुलाकातें अपने आप में असामान्य नहीं होतीं, लेकिन जब एक ही समय में कई बड़े चेहरे केंद्रीय नेतृत्व के संपर्क में हों और प्रदेश में चुनावी हार के बाद संगठनात्मक बदलाव चल रहा हो, तब इन मुलाकातों के राजनीतिक अर्थ निकाले जाना स्वाभाविक है।


अगली परीक्षा नगरीय निकाय चुनाव


दतिया का परिणाम अब बीत चुका है। भाजपा के सामने असली चुनौती यह है कि वह इस हार से क्या सीखती है।


आने वाले नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों में संगठन की एकजुटता, स्थानीय नेतृत्व और कार्यकर्ताओं की नाराजगी निर्णायक हो सकती है। दतिया ने संकेत दे दिया है कि केवल सत्ता और संगठन की ताकत के भरोसे हर चुनाव जीतना संभव नहीं।


अब सवाल यह नहीं कि दिल्ली में कौन किससे मिला। असली सवाल यह है कि इन मुलाकातों में मध्यप्रदेश भाजपा की बदलती तस्वीर पर क्या बात हुई—और क्या दतिया की हार के बाद पार्टी सचमुच अपने भीतर झांकने को तैयार है?


नोट: ऊपर के राजनीतिक निष्कर्ष विश्लेषण हैं; संबंधित नेताओं की मुलाकातों में क्या चर्चा हुई, इसका आधिकारिक विवरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होने पर उसे तथ्य के रूप में नहीं लिखा गया है।

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