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मालवा में संघ का ‘छोटा प्रांत, बड़ा विस्तार’ मॉडल!

 


मार्च 2027 से इंदौर-उज्जैन अलग संभाग, प्रांत प्रचारक की जगह संभाग प्रचारक—5 हजार से ज्यादा शाखाओं वाले क्षेत्र में संगठन को और जमीन तक ले जाने की तैयारी

प्रणव बजाज


इंदौर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ माल Uवा में अब संगठन का नक्शा छोटा कर पहुंच बड़ी करने की तैयारी में है। वर्ष 2009 में बनाए गए मालवा प्रांत को मार्च 2027 से इंदौर और उज्जैन संभाग में बांटने का फैसला किया गया है। इस बदलाव के बाद प्रांत प्रचारक की मौजूदा व्यवस्था की जगह संभाग स्तर पर प्रचारकों को जिम्मेदारी देने की तैयारी है।



नाम बदलेंगे या काम करने का तरीका भी?


संघ की ओर से इस बदलाव का उद्देश्य संगठन को अधिक विकेंद्रित कर समाज तक पहुंच बढ़ाना बताया गया है। मालवा क्षेत्र में पांच हजार से अधिक शाखाएं संचालित होने की जानकारी सामने आई है और नई व्यवस्था के बाद संगठनात्मक विस्तार को और गति देने की तैयारी है।


सीधा गणित है—एक बड़ी जिम्मेदारी को दो हिस्सों में बांटो, निगरानी और संपर्क दोनों बढ़ाओ।


मध्यप्रदेश में अभी तीन प्रांत—मालवा, महाकौशल और मध्यभारत—की व्यवस्था है। प्रस्तावित बदलाव के बाद प्रांत स्तर की जगह संभागीय ढांचा अधिक महत्वपूर्ण होगा और प्रदेश स्तर पर कार्यसमिति की व्यवस्था बनी रहेगी।


युवा और सामाजिक विस्तार पर नजर


संघ के शताब्दी वर्ष में संगठन का जोर युवाओं तक पहुंच बढ़ाने, सामाजिक संपर्क मजबूत करने और आनुषंगिक संगठनों की भूमिका बढ़ाने पर दिखाई दे रहा है। मालवा क्षेत्र में हजारों शाखाओं के अलावा साप्ताहिक मिलन और सेवा गतिविधियों का भी व्यापक नेटवर्क बताया गया है।


यानी अब रणनीति केवल शाखा बढ़ाने की नहीं, समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंच बनाने की है।


इंदौर और उज्जैन के लिए अलग कमान


नई व्यवस्था में इंदौर और उज्जैन को अलग-अलग संगठनात्मक जिम्मेदारी मिलने से स्थानीय स्तर पर निर्णय और संपर्क का दायरा अधिक केंद्रित हो सकता है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार नई संभागीय संरचना मार्च 2027 तक लागू करने की तैयारी है।


व्यंग्य की एक लाइन


मालवा का नक्शा छोटा होगा, लेकिन संघ की नजर और लंबी—अब एक प्रांत नहीं, दो संभाग सीधे मैदान में!


बौद्धिक प्रतिकार की नजर


यह बदलाव केवल प्रशासनिक पुनर्गठन मानकर छोड़ देना अधूरा होगा। संघ जैसे कैडर आधारित संगठन में भौगोलिक इकाई को छोटा करना स्वाभाविक रूप से स्थानीय नेतृत्व, संपर्क और विस्तार की क्षमता बढ़ाने की रणनीति भी हो सकता है।


सवाल यही है—


क्या दो संभागों में बंटकर मालवा का संघ कमजोर होगा, या दोहरी संगठनात्मक ताकत के साथ और ज्यादा दूर तक पहुंचेगा?


मार्च 2027 के बाद इसका जवाब जमीन पर दिखाई देगा।

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