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दतिया भाजपा में जिलाध्यक्ष की कुर्सी नहीं, 2028 का टिकट दांव पर!

 

प्रणव बजाज

तिवारी बनें तो टिकट फंसे, पिरोनिया आएं तो भांडेर का सवाल; कुशवाह समाज को नाराज करने का जोखिम अलग—भाजपा के सामने अध्यक्ष चुनने से बड़ा सामाजिक समीकरण साधने का संकट


उपचुनाव की हार के बाद संगठन भंग, अब एक कुर्सी पर कई हिसाब-किताब

दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की हार के बाद जिला संगठन को भंग कर दिया गया है। अब नई टीम बनाने की कवायद शुरू होते ही जिलाध्यक्ष की एक कुर्सी ने भाजपा के भीतर 2028 की विधानसभा राजनीति का पूरा गणित सामने ला दिया है। चर्चा में दो प्रमुख नाम हैं—आशुतोष तिवारी और घनश्याम पिरोनिया।


मगर असली सवाल यह नहीं है कि जिलाध्यक्ष कौन बनेगा। असली सवाल यह है कि कौन ऐसा चेहरा होगा जो संगठन भी संभाले, जातीय समीकरण भी साधे और 2028 में टिकट की दौड़ को भी प्रभावित न करे?


यानी भाजपा के सामने कुर्सी छोटी है और हिसाब-किताब बड़ा।


तिवारी के नाम के साथ 2028 की टिकट का पेच


आशुतोष तिवारी दतिया उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी रहे और संगठन के सक्रिय चेहरों में माने जाते हैं। जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिलती है तो अगले डेढ़-दो साल संगठन को दोबारा खड़ा करने, मंडल स्तर पर पकड़ मजबूत करने और निकाय चुनाव की तैयारी में लग सकते हैं।


लेकिन इसके बाद 2028 विधानसभा चुनाव की टिकट की दौड़ शुरू होगी।


यहीं राजनीतिक पेच पैदा होता है।


क्या कोई व्यक्ति संगठन का जिलाध्यक्ष रहते हुए उसी विधानसभा सीट का मजबूत टिकट दावेदार भी रह पाएगा?


क्योंकि जिलाध्यक्ष से पार्टी संगठन मजबूत करने के साथ चुनाव जिताने की अपेक्षा भी करती है। ऐसे में तिवारी के सामने राजनीतिक रूप से दो रास्ते दिखाई देते हैं—संगठन की कमान या 2028 की विधानसभा टिकट की तैयारी।


भाजपा के लिए यह फैसला केवल नियुक्ति नहीं, बल्कि 2028 की रणनीति का शुरुआती संकेत भी माना जाएगा।


पिरोनिया का नाम आया तो भांडेर का गणित जागेगा


दूसरा चर्चित नाम घनश्याम पिरोनिया का है। पूर्व विधायक और प्रदेश प्रवक्ता पिरोनिया भांडेर विधानसभा से फिर दावेदारी रखने वाले नेताओं में शामिल माने जाते हैं।


ऐसे में यदि उन्हें जिलाध्यक्ष बनाया जाता है तो वही सवाल उनके सामने भी खड़ा होगा—जिला संगठन संभालें या 2028 की विधानसभा तैयारी?


और भाजपा के सामने इससे भी बड़ा सवाल होगा—क्या जिला अध्यक्ष ऐसा बनाया जाए जिसका खुद विधानसभा क्षेत्र में राजनीतिक हित जुड़ा हो?


ब्राह्मण बनाम दलित नहीं, सवाल है पूरा सामाजिक समीकरण


तिवारी के नाम के साथ ब्राह्मण और व्यापारी वर्ग के समीकरण को साधने की चर्चा है। दूसरी ओर पिरोनिया के नाम के साथ दलित प्रतिनिधित्व का गणित जुड़ता है।


उपचुनाव में कांग्रेस के घनश्याम सिंह की जीत के बाद भाजपा के लिए दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग का समीकरण और महत्वपूर्ण हो गया है।


लेकिन भाजपा के सामने केवल ब्राह्मण और दलित समीकरण नहीं है।


कुशवाह समाज की नाराजगी का सवाल भी मेज पर रखा है।


रघुवीर कुशवाह को हटाया, अब समाज को कैसे समझाएगी भाजपा?


जिला अध्यक्ष पद से रघुवीर कुशवाह को हटाए जाने के बाद कुशवाह समाज का राजनीतिक संदेश भी अहम हो गया है।


रघुवीर कुशवाह का कहना रहा है कि उन्होंने चुनाव से पहले इस्तीफा दिया था, बावजूद इसके उन पर कार्रवाई नहीं हुई। उनका यह भी कहना है कि चुनाव में पूरी मेहनत करने के बाद अब हार का ठीकरा उन पर फोड़ा जा रहा है।


अब भाजपा यदि नया जिलाध्यक्ष चुनती है तो उसके सामने केवल नया चेहरा घोषित करने का सवाल नहीं होगा।


सवाल यह भी होगा कि कुशवाह समाज को क्या संदेश दिया जाए?


35 हजार वोटों का हिसाब कौन करेगा?


दतिया में करीब 35 हजार कुशवाह मतदाता बताए जाते हैं। यही संख्या भाजपा के लिए इस पूरे घटनाक्रम को और संवेदनशील बनाती है।


पिछले विधानसभा चुनाव में ग्रामीण क्षेत्र में कुशवाह समाज की नाराजगी को नरोत्तम मिश्रा की हार के कारणों में भी गिना गया था। इसके बाद रघुवीर कुशवाह को ग्रामीण मंडल अध्यक्ष से जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई थी।


अब वही संगठनात्मक प्रयोग बदल दिया गया है।


भाजपा के सामने चुनौती है—चेहरा बदलना आसान है, लेकिन सामाजिक भरोसा वापस लाना इतना आसान नहीं।


नरोत्तम मिश्रा के बाद कौन? सबसे बड़ा सवाल यही


दतिया की राजनीति लंबे समय तक नरोत्तम मिश्रा के प्रभाव के इर्द-गिर्द घूमती रही है। अब भाजपा के सामने चुनौती केवल जिला अध्यक्ष चुनने की नहीं, बल्कि ऐसा संगठन खड़ा करने की है जो किसी एक चेहरे के प्रभाव से आगे निकलकर पार्टी को बूथ स्तर तक मजबूत कर सके।


इसीलिए नए जिलाध्यक्ष का चयन दतिया भाजपा में आने वाले दिनों की राजनीति का संकेत भी माना जा रहा है।


निकाय चुनाव सिर पर, संगठन जमीन पर नहीं


पूरे जिले की संगठनात्मक संरचना भंग होने के बाद दतिया के साथ सेवढ़ा और भांडेर में भी संगठन को नए सिरे से सक्रिय करना होगा।


अगले साल प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनाव भाजपा के लिए पहली बड़ी परीक्षा होंगे।


यानी नए जिलाध्यक्ष को पद संभालते ही—



संगठन की नई टीम बनानी होगी।


मंडलों में गुटबाजी रोकनी होगी।


कार्यकर्ताओं को फिर सक्रिय करना होगा।


निकाय चुनाव की तैयारी करनी होगी।


दतिया, सेवढ़ा और भांडेर में संगठन मजबूत करना होगा।


अलग-अलग सामाजिक समूहों को साथ रखना होगा।


और 2028 के विधानसभा चुनाव की जमीन भी तैयार करनी होगी।




इतना सब करने के बाद अगर टिकट का सवाल भी सामने खड़ा हो जाए तो जिलाध्यक्ष की कुर्सी आखिर कितनी आरामदायक रहेगी?


बौद्धिक प्रतिकार की पड़ताल


दतिया भाजपा में जिलाध्यक्ष की तलाश असल में अध्यक्ष की तलाश नहीं, 2028 के राजनीतिक चेहरे की तलाश बनती दिखाई दे रही है।


तिवारी के सामने जिलाध्यक्ष बनकर संगठन खड़ा करने बनाम विधानसभा टिकट की तैयारी का सवाल है।


पिरोनिया के सामने जिला संगठन बनाम भांडेर की दावेदारी का सवाल है।


भाजपा के सामने ब्राह्मण, दलित, कुशवाह और अन्य पिछड़ा वर्ग के सामाजिक संतुलन का सवाल है।


और संगठन के सामने सबसे बड़ा सवाल है—


“हार का हिसाब हो गया… अब जीत का सामाजिक समीकरण कौन बनाएगा?”


दतिया में जिलाध्यक्ष की कुर्सी खाली है, लेकिन उस कुर्सी पर बैठने वाले के पीछे 2028 की पूरी राजनीति खड़ी दिखाई दे रही है।

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