संपादकीयप्रणव बजाज
अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक जिज्ञासा और मानव महत्वाकांक्षा का क्षेत्र नहीं रहा। वह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अदृश्य आधार बन चुका है। दिशा बताने वाला यंत्र हो, मौसम की जानकारी हो, बैंकिंग व्यवस्था हो, आपातकालीन सेवाएं हों या इंटरनेट संचार—इन सबके पीछे पृथ्वी की कक्षा में घूम रहे उपग्रहों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
लेकिन जिस तेजी से अंतरिक्ष में उपग्रहों की संख्या बढ़ रही है, उसी तेजी से एक नया संकट भी आकार ले रहा है। पृथ्वी की कक्षा में लगभग 16 हजार उपग्रहों की मौजूदगी और आने वाले वर्षों में इनकी संख्या एक लाख से अधिक होने की संभावना केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी भी है।
सवाल यह नहीं है कि हम कितने उपग्रह अंतरिक्ष में भेज सकते हैं। असली सवाल यह है कि हम उन्हें कितनी जिम्मेदारी से चला सकते हैं?
कृत्रिम बुद्धिमत्ता से उपग्रहों की निगरानी, खराबी की पहचान और संचालन को अधिक स्वचालित बनाने की उम्मीद जरूर है। लेकिन यह मान लेना कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता हर खराबी को रोक देगी या हर संकट का समाधान कर देगी, खतरनाक आत्मविश्वास होगा। अंतरिक्ष में एक छोटी तकनीकी त्रुटि भी करोड़ों रुपये की संपत्ति को निष्क्रिय कर सकती है और उससे भी गंभीर स्थिति में दूसरे उपग्रहों के लिए खतरा पैदा कर सकती है।
अंतरिक्ष में बढ़ती भीड़ का एक दूसरा पहलू अंतरिक्ष मलबा है। निष्क्रिय उपग्रह, उनके टूटे हुए हिस्से और प्रक्षेपण के बाद बची वस्तुएं पृथ्वी की कक्षा को धीरे-धीरे जोखिमपूर्ण बना रही हैं। यदि इस समस्या पर अभी गंभीरता से नियंत्रण नहीं किया गया तो भविष्य में नए उपग्रह भेजना ही नहीं, उन्हें सुरक्षित रखना भी चुनौती बन जाएगा।
यहां सरकारों, अंतरिक्ष एजेंसियों और निजी कंपनियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उपग्रह भेजने की अनुमति के साथ उनकी पूरी जीवन-यात्रा की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। कौन-सा उपग्रह कितने वर्षों तक काम करेगा, उसके निष्क्रिय होने के बाद उसे कक्षा से कैसे हटाया जाएगा, खराब होने पर उससे पैदा होने वाले खतरे का जिम्मेदार कौन होगा—इन सवालों के स्पष्ट नियम जरूरी हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता इस चुनौती का महत्वपूर्ण समाधान बन सकती है, लेकिन वह अंतिम समाधान नहीं है। तकनीक को मानव निगरानी, कठोर सुरक्षा मानकों और अंतरराष्ट्रीय नियमों के साथ जोड़ना होगा।
अंतरिक्ष किसी एक देश या कंपनी की निजी संपत्ति नहीं है। वहां बढ़ती भीड़ का असर पूरी मानव सभ्यता पर पड़ सकता है। इसलिए अंतरिक्ष की दौड़ में केवल ‘कितना आगे’ पहुंचना लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि यह भी तय होना चाहिए कि ‘कितना सुरक्षित और टिकाऊ’ आगे बढ़ा जा सकता है।
आज यदि हमने अंतरिक्ष को केवल व्यावसायिक अवसर और तकनीकी प्रतिस्पर्धा समझकर नियमों की अनदेखी की, तो आने वाली पीढ़ियां एक ऐसे अंतरिक्ष की कीमत चुका सकती हैं जिसे हमने अव्यवस्थित कर दिया।
अंतरिक्ष में भीड़ बढ़ रही है। अब समय है कि महत्वाकांक्षा के साथ जिम्मेदारी भी बढ़े। क्योंकि उपग्रह बंद होने का खतरा केवल मशीन का खतरा नहीं—पूरी आधुनिक व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है।
बौद्धिक प्रतिकार की साफ बात
अंतरिक्ष जीतने की होड़ से पहले उसे बचाने की नीति बनानी होगी।

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