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मोहन यादव सरकार के लगभग तीन साल: विकास के दावों के बीच भ्रष्टाचार, कर्ज और प्रशासनिक संकट के सवाल*

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लोकायुक्त के 229 शिकंजे, नर्सिंग महाघोटाले पर हाईकोर्ट की सख्ती, करोड़ों की संदिग्ध संपत्ति का मामला, जल जीवन मिशन पर कैग की आपत्तियां और अपनी ही सरकार से सवाल पूछते भाजपा विधायक—क्या मध्यप्रदेश में व्यवस्था मजबूत हुई या जवाबदेही कमजोर?



प्रणव बजाज विशेष रिपोर्ट | बौद्धिक प्रतिकार


13 दिसंबर 2023 को मोहन यादव ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। अगस्त 2026 तक सरकार का कार्यकाल करीब 32 महीने का हो चुका है। इस अवधि को केवल राजनीतिक नारों या सरकारी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के मामलों, प्रशासनिक जवाबदेही, सार्वजनिक धन के इस्तेमाल, कानून-व्यवस्था और भाजपा के भीतर उठती आवाजों से भी परखना जरूरी है।


पड़ताल में तस्वीर एकतरफा नहीं है। सरकार विकास और निवेश की उपलब्धियां गिना रही है, लेकिन दूसरी तरफ जांच एजेंसियों, न्यायपालिका और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्टों ने व्यवस्था के कई कमजोर हिस्सों को सामने रखा है।




सबसे बड़ा सवाल: भ्रष्टाचार नीचे है या व्यवस्था में?


2025 में मध्यप्रदेश लोकायुक्त पुलिस ने 229 सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों को कथित रिश्वतखोरी के मामलों में पकड़ा। इनमें राजस्व, पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग के कर्मचारी बड़ी संख्या में थे। कार्रवाई में कंप्यूटर संचालक से लेकर अभियंता, तहसीलदार और मुख्य नगर पालिका अधिकारी तक के नाम सामने आए।


मऊगंज में शिक्षा विभाग के सहायक ग्रेड-3 कर्मचारी राजाराम गुप्ता को सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक की बकाया राशि जारी करने के बदले कथित तौर पर 6.20 लाख रुपये रिश्वत लेते पकड़ा गया। शिकायत के मुताबिक मांगी गई राशि करीब 12.70 लाख रुपये के भुगतान का आधा हिस्सा थी।


यह घटनाएं यह साबित नहीं करतीं कि पूरा शासन भ्रष्ट है, लेकिन एक सवाल जरूर खड़ा करती हैं—


अगर छोटे-छोटे कामों के लिए रिश्वत के इतने मामले सामने आ रहे हैं तो प्रशासनिक निगरानी आखिर कहां है?




सौरभ शर्मा मामला: परिवहन व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल


दिसंबर 2024 में पूर्व परिवहन विभाग आरक्षक सौरभ शर्मा के परिसरों और उससे जुड़े ठिकानों पर जांच एजेंसियों की कार्रवाई ने पूरे प्रदेश को चौंका दिया।


जांच के दौरान करीब 14 करोड़ रुपये नकद, 40 करोड़ रुपये से अधिक का सोना, लगभग 2 करोड़ रुपये की चांदी और संपत्तियों से जुड़े दस्तावेज बरामद होने की रिपोर्ट सामने आई। एक अलग कार्रवाई में भोपाल के पास एक लावारिस वाहन से लगभग 11 करोड़ रुपये नकद और 52 किलो सोना बरामद होने की खबर भी सामने आई। मामले में प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग और लोकायुक्त की जांच चली।


सबसे बड़ा सवाल रकम से भी बड़ा था—


एक पूर्व आरक्षक के पास इतनी संपत्ति कैसे पहुंची?


और इससे भी बड़ा सवाल—


क्या यह केवल एक व्यक्ति का मामला था या परिवहन विभाग में लंबे समय से चल रही किसी बड़ी व्यवस्था की परत?


इन सवालों का अंतिम जवाब जांच और अदालत की प्रक्रिया से ही आएगा। लेकिन इस मामले ने सरकारी तंत्र की निगरानी पर गंभीर सवाल जरूर खड़े किए।




नर्सिंग घोटाला: हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी को ही कठघरे में खड़ा किया


मध्यप्रदेश का नर्सिंग कॉलेज मामला सरकार और प्रशासन के लिए सबसे गंभीर संस्थागत सवालों में से एक रहा।


मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 2024 में 169 नर्सिंग कॉलेजों की दोबारा जांच के आदेश दिए। अदालत के सामने ऐसी परिस्थितियां आईं जिनमें पहले की जांच और कॉलेजों को दी गई मंजूरी पर सवाल उठे।


दिसंबर 2024 में हाईकोर्ट ने मध्यप्रदेश नर्सेस पंजीयन परिषद की तत्कालीन पंजीयक अनिता चांद और अध्यक्ष डॉ. जितेंद्र चंद्र शुक्ल को पद से हटाने का निर्देश दिया। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को हटाकर साफ-सुथरी सेवा पृष्ठभूमि वाले अधिकारियों की नियुक्ति करने को कहा।


यहां सवाल सिर्फ नर्सिंग कॉलेजों का नहीं है।


सवाल यह है कि जिस व्यवस्था को निगरानी करनी थी, उसी व्यवस्था में गड़बड़ी की शिकायतें क्यों पैदा हुईं?




जल जीवन मिशन: पाइप पहुंचा या सिर्फ कागज?


22 जुलाई 2026 को नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने मध्यप्रदेश में जल जीवन मिशन के क्रियान्वयन पर प्रदर्शन लेखापरीक्षा रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट 31 मार्च 2024 तक की अवधि से संबंधित है।


रिपोर्ट पर आधारित सामने आई जानकारी में परियोजनाओं को आवश्यक व्यवहार्यता और आधारभूत अध्ययन के बिना स्वीकृत करने तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्रों की अनदेखी जैसी गंभीर आपत्तियां सामने आई हैं।


मौजूदा स्थिति को एक और घटना ने झटका दिया—मऊगंज में जल जीवन मिशन के तहत निर्माणाधीन पानी की टंकी परीक्षण के दौरान ढह गई और एक उपयंत्री को निलंबित किया गया।


योजना का नाम ‘जल जीवन’ है, लेकिन सवाल अब ‘जल हिसाब’ का है।




60 हजार करोड़ से ज्यादा खर्च का हिसाब कागजों में क्यों अटका?


2026 में सामने आई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की वित्तीय पड़ताल में राज्य के विभिन्न विभागों से जुड़े 81 हजार से अधिक उपयोगिता प्रमाण-पत्र लंबित होने और करीब 60,113 करोड़ रुपये के खर्च का उपयोगिता प्रमाण प्रस्तुत नहीं होने की रिपोर्ट सामने आई।


उपयोगिता प्रमाण-पत्र का मतलब यह बताना होता है कि जारी धन वास्तव में जिस काम के लिए दिया गया था, उसमें खर्च हुआ या नहीं।


इसलिए यह सिर्फ कागजी कमी नहीं है।


सरकार को बताना होगा—पैसा निकला तो काम कहां हुआ?




कर्ज बढ़ा, बजट बड़ा… लेकिन विकास की कीमत कौन देगा?


2026-27 के बजट में मध्यप्रदेश का कुल व्यय करीब 4.23 लाख करोड़ रुपये अनुमानित है। राज्य को लगभग 1.06 लाख करोड़ रुपये उधार लेने का अनुमान रखा गया है।


राजस्व अधिशेष का अनुमान केवल 44 करोड़ रुपये है, जबकि 2025-26 के संशोधित अनुमान में यह केवल 7 करोड़ रुपये रह गया था। 2026-27 में राज्य का राजकोषीय घाटा करीब 71,458 करोड़ रुपये, यानी सकल राज्य घरेलू उत्पाद का 3.9 प्रतिशत अनुमानित है।


सरकार के पास विकास की योजनाएं हैं, लेकिन कर्ज और ब्याज का बोझ भी बढ़ रहा है।


घोषणाओं का आकार बढ़ रहा है, क्या आर्थिक आत्मनिर्भरता भी उतनी ही तेजी से बढ़ रही है?




विधानसभा में विपक्ष ही नहीं, भाजपा विधायक भी सवाल पूछ रहे हैं


अप्रैल 2025 में मध्यप्रदेश विधानसभा में ऐसा मामला सामने आया जब भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के विधायकों ने सरकार पर उनके सवालों के संतोषजनक जवाब नहीं देने का आरोप लगाया।


राजस्व विभाग से जमीन सौदों और अन्य मामलों पर पूछे गए सवालों के जवाब में विधायकों को विधानसभा पुस्तकालय के परिशिष्टों की ओर भेजा गया, लेकिन संबंधित जानकारी वहां उपलब्ध नहीं मिली।


यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक असंतोष की चर्चा को तथ्य से जोड़ा जा सकता है।


जब विपक्ष सवाल पूछे तो उसे राजनीति कहा जा सकता है, लेकिन अपनी ही पार्टी के विधायक सवाल पूछें तो सरकार को जवाबदेही की चिंता करनी ही होगी।




दतिया उपचुनाव: भाजपा के लिए खतरे की घंटी?


2026 के दतिया विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,016 मतों से हराया।


इसके बाद भाजपा ने दतिया की जिला संगठन इकाई को भंग कर दिया। पार्टी के भीतर संभावित अंदरूनी असंतोष और चुनावी रणनीति पर भी चर्चा शुरू हुई।


यह परिणाम अकेले पूरे प्रदेश में भाजपा के खिलाफ जनमत का प्रमाण नहीं है। लेकिन मजबूत राजनीतिक आधार वाले क्षेत्र में संगठनात्मक इकाई का भंग होना यह जरूर बताता है कि भाजपा खुद अपने संगठन की स्थिति की समीक्षा को गंभीरता से ले रही है।




कानून-व्यवस्था: अपराध के आंकड़े सरकार को आईना दिखाते हैं


अपराध के मामले में किसी एक सरकार को हर घटना के लिए सीधे जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। अपराध सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक कई कारणों से प्रभावित होता है।


फिर भी आंकड़ों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


एनसीआरबी के 2023 के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्टों के अनुसार मध्यप्रदेश बच्चों के खिलाफ अपराधों के मामले में देश के सबसे गंभीर प्रभावित राज्यों में रहा और महिलाओं के खिलाफ अपराधों में भी राज्य की स्थिति चिंता का विषय बनी रही।


दूसरी ओर, 2024 में देशभर में साइबर अपराध के मामलों में 17.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई। मध्यप्रदेश भी इस बदलती अपराध व्यवस्था से अछूता नहीं रह सकता।


और जब अवैध रेत खनन रोकने गई सरकारी टीम पर ही हमला हो, जैसा कि अगस्त 2026 में खरगोन में हुआ, तो सवाल केवल माफिया का नहीं बल्कि राज्य की कानून लागू करने की क्षमता का भी बन जाता है।




मोहन यादव परिवार की जमीन खरीद पर विवाद: आरोप बनाम जवाब


जून 2026 में इंडियन एक्सप्रेस की एक पड़ताल ने मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार और उनसे जुड़ी रियल एस्टेट कंपनियों द्वारा उज्जैन में जमीन खरीद पर सवाल उठाए। रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर 2023 के बाद परिवार और उससे जुड़ी कंपनियों ने कम से कम 137 भूखंड, कुल 168 एकड़, करीब 45 करोड़ रुपये में खरीदे; रिपोर्ट ने इनमें से कई जमीनों को उन क्षेत्रों के आसपास बताया जहां सड़क परियोजनाएं और भूमि उपयोग परिवर्तन से जुड़े विकास हो रहे थे।


भाजपा और राज्य सरकार के प्रतिनिधियों ने इन आरोपों को बेबुनियाद और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया। सरकार के अधिकारियों ने भी कहा कि मुख्यमंत्री का विस्तारित परिवार पहले से रियल एस्टेट कारोबार में है।


इसलिए इस मामले में अभी सबसे जिम्मेदार पत्रकारिता यही है कि इसे सिद्ध भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि गंभीर हित-संघर्ष के आरोपों की जांच का विषय माना जाए।


सवाल है—क्या स्वतंत्र जांच से संदेह दूर किया जाएगा?




तो क्या मध्यप्रदेश में ‘गुंडाराज’ है?


इस शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक भाषण में आसानी से किया जा सकता है, लेकिन पत्रकारिता में इसे प्रमाणित करने के लिए ठोस आंकड़े चाहिए।


जो तथ्य सामने हैं वे बताते हैं कि प्रदेश में—


रिश्वत के मामले हैं।

भ्रष्टाचार के मामलों में लोकायुक्त कार्रवाई कर रहा है।

नर्सिंग व्यवस्था पर हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए।

जल जीवन मिशन पर कैग की आपत्तियां हैं।

सरकारी खर्च के उपयोगिता प्रमाण-पत्रों पर गंभीर सवाल हैं।

भाजपा के अपने विधायक सरकार से जवाब मांग चुके हैं।

दतिया में भाजपा को संगठनात्मक झटका लगा है।

अवैध खनन रोकने वाली सरकारी टीम पर हमला हुआ है।


लेकिन इसके साथ यह भी तथ्य है कि सरकार विकास, निवेश, नवीकरणीय ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के विस्तार के दावे कर रही है। मसलन, मुख्यमंत्री ने अगस्त 2026 में बताया कि मध्यप्रदेश की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता पिछले 12 वर्षों में 438 मेगावाट से बढ़कर 11 हजार मेगावाट से अधिक हो गई है।


इसलिए तस्वीर को केवल ‘विकास नहीं हुआ’ या ‘सब भ्रष्ट है’ कहना भी अधूरा होगा।




बौद्धिक प्रतिकार का सवाल


मोहन यादव से सवाल नहीं, पूरी व्यवस्था से पांच सवाल


1. लोकायुक्त के 229 मामलों के बाद कितने मामलों में अंतिम सजा हुई?


2. नर्सिंग घोटाले में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही कितनी तय हुई?


3. जल जीवन मिशन की कैग आपत्तियों पर कितनी कार्रवाई हुई?


4. 60 हजार करोड़ रुपये से अधिक के लंबित उपयोगिता प्रमाण-पत्रों का हिसाब कब सामने आएगा?


5. सौरभ शर्मा प्रकरण में कथित भ्रष्ट तंत्र की जड़ तक जांच कब पहुंचेगी?




अंतिम सवाल—चेहरा बदलने से व्यवस्था बदलेगी या व्यवस्था बदलने से चेहरा बचेगा?


मध्यप्रदेश की असली परीक्षा मुख्यमंत्री की लोकप्रियता या विपक्ष के आरोपों से नहीं होगी।


परीक्षा होगी फाइलों में।


जहां रिश्वत मांगी जाती है, वहां कार्रवाई से।


जहां सरकारी पैसा खर्च होता है, वहां हिसाब से।


जहां सड़क बनती है, वहां गुणवत्ता से।


जहां पानी पहुंचना है, वहां नल में पानी आने से।


जहां अपराध होता है, वहां अपराधी के खिलाफ कानून के डर से।


और जहां सत्ता से जुड़े लोगों पर आरोप लगते हैं, वहां निष्पक्ष जांच की पारदर्शिता से।


क्योंकि मध्यप्रदेश को नारे नहीं—नतीजे चाहिए।


सवाल यह नहीं कि मोहन यादव सरकार भाजपा की सरकार है या नहीं।

सवाल यह है कि भाजपा की सरकार में आम आदमी को न्याय, अधिकारी को निष्पक्ष व्यवस्था और सरकारी खजाने को ईमानदार पहरेदार मिल रहा है या नहीं?


यही आने वाले समय में मोहन यादव सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा होगी।

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