15 साल बाद उसी गोदाम पर फिर क्राइम ब्रांच की दबिश
9 संदिग्ध इंजन चोरी की गाड़ियों से जुड़े मिले, 3 के नंबर घिसे
2011 में भी हुई थी कार्रवाई... फिर इतने साल तक कौन था बेखबर?
बौद्धिक प्रतिकार | इंदौर
गाड़ियां चोरी होती रहीं और कबाड़ के गोदामों में उनके पुर्जे कटते रहे—यह सवाल अब इंदौर पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी उठ रहा है। दौलतगंज-झंडा चौक के पीछे उर्दू मैदान के पास अल्ताफ अंसारी से जुड़े गोदामों पर क्राइम ब्रांच की कार्रवाई में करीब 12 संदिग्ध इंजन मिले। पुलिस के अनुसार इनमें से 9 इंजन के नंबर चोरी के वाहनों से जुड़े पाए गए हैं, जबकि तीन इंजन के नंबर घिसे हुए मिले।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसी गोदाम पर मार्च 2011 में भी कार्रवाई हो चुकी है। उस समय भी पुलिस ने वाहन, इंजन, चेसिस और बड़ी मात्रा में पुर्जे बरामद किए थे।
अब 15 साल बाद फिर उसी तरह की बरामदगी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
बड़ा सवाल—2011 के बाद निगरानी कहां थी?
यदि 2011 की कार्रवाई में चोरी के वाहनों के पुर्जे मिलने की बात सामने आई थी, तो उसके बाद इस कारोबार की लगातार निगरानी क्यों नहीं हुई?
क्या कबाड़ कारोबार के नाम पर आने वाले वाहनों के दस्तावेजों की नियमित जांच होती थी?
क्या स्थानीय पुलिस को इस गतिविधि की जानकारी नहीं थी?
या फिर सूचना तंत्र इतना कमजोर था कि वर्षों तक इतना बड़ा कारोबार उसकी नजर से बाहर रहा?
इन सवालों का जवाब अब जांच में तलाशना जरूरी है।
क्राइम ब्रांच ने तीन ठिकानों पर की कार्रवाई
टीआई विष्णु वास्कले के नेतृत्व में क्राइम ब्रांच की टीम ने दुकान सहित तीन स्थानों पर जांच की। पुलिस के मुताबिक कटे हुए दोपहिया वाहनों के इंजन, चेसिस और अन्य पुर्जे मिले।
अल्ताफ अंसारी और उसके बेटे अरशद को गिरफ्तार कर प्रकरण दर्ज किया गया है। पुलिस अब वाहनों के स्रोत, दस्तावेज और खरीद-बिक्री से जुड़े लोगों की जानकारी जुटा रही है।
कबाड़ या चोरी के वाहनों का नेटवर्क?
अल्ताफ अंसारी ने पूछताछ में वाहनों को कबाड़ के रूप में खरीदने की बात कही है। यदि ऐसा है तो प्रत्येक वाहन का खरीद रिकॉर्ड, दस्तावेज और वैध कबाड़ प्रमाण की जांच होनी चाहिए।
लेकिन यदि जांच में चोरी की गाड़ियों को काटकर उनकी पहचान मिटाने और इंजन-पुर्जे बाजार में खपाने का नेटवर्क सामने आता है, तो मामला केवल एक कबाड़ गोदाम का नहीं रहेगा।
फिर सवाल होगा—गाड़ी चोरी करने वाला कौन, गोदाम तक पहुंचाने वाला कौन और पुर्जे खरीदने वाला कौन?
पुलिस की अगली परीक्षा
क्राइम ब्रांच ने कार्रवाई कर दी। अब असली परीक्षा जांच की है।
2011 की फाइल से 2026 की बरामदगी तक पूरी कड़ी जोड़नी होगी।
कितने वाहन चोरी हुए?
कितने यहां पहुंचे?
किसने बेचे?
किसने खरीदे?
कहां काटे गए?
इंजन और चेसिस कहां गए?
और पुर्जे किन बाजारों में बेचे गए?
इन सवालों के जवाब मिले तो संभव है कि एक गोदाम नहीं, पूरा नेटवर्क सामने आए।
बौद्धिक प्रतिकार का सवाल
15 साल पहले भी कार्रवाई।
15 साल बाद फिर कार्रवाई।
तो सवाल सीधा है—
कार्रवाई हुई थी या सिर्फ खानापूर्ति?
चोरी की गाड़ियों का खेल अगर सचमुच इतना पुराना है, तो अब सिर्फ इंजन नहीं—पूरे नेटवर्क का हिसाब होना चाहिए।

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