सावन मास की अमावस्या को हरियाली अमावस्या के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व 12 अगस्त को मनाया जाएगा। सावन के कारण इस अमावस्या का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा, स्नान-दान, पितरों का स्मरण और पौधरोपण करने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है।
भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व
सावन भगवान शिव को समर्पित महीना माना जाता है। इसलिए हरियाली अमावस्या पर शिवलिंग पर जल अर्पित करके भगवान शिव का पूजन किया जाता है। श्रद्धालु बेलपत्र, फूल और अन्य पूजन सामग्री अपनी परंपरा के अनुसार अर्पित करते हैं।
पितरों का स्मरण और दान
अमावस्या तिथि को पितरों के स्मरण और उनके निमित्त दान-पुण्य के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान कर सकते हैं।
पौधरोपण की परंपरा क्यों?
हरियाली अमावस्या का नाम ही हरियाली से जुड़ा है। वर्षा ऋतु में पेड़-पौधे तेजी से बढ़ते हैं, इसलिए इस दिन पौधे लगाने की परंपरा भी कई स्थानों पर देखने को मिलती है। धार्मिक दृष्टि से इसे पुण्य का कार्य माना जाता है, जबकि पर्यावरण की दृष्टि से भी पौधरोपण का विशेष महत्व है।
इस दिन क्या करें?
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
भगवान शिव की श्रद्धापूर्वक पूजा करें।
शिवलिंग पर जल अर्पित करें।
पितरों का स्मरण करें और सामर्थ्य के अनुसार दान करें।
पौधे लगाएं और उनकी नियमित देखभाल का संकल्प लें।
जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या उपयोगी सामग्री दान करें।
हरियाली अमावस्या का संदेश
हरियाली अमावस्या केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा पर्व नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संदेश भी देता है। सावन की हरियाली के बीच पौधरोपण और उनकी देखभाल आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
नोट: अमावस्या की तिथि और पूजा के स्थानीय समय में पंचांग तथा स्थान के अनुसार अंतर हो सकता है। पूजा के लिए अपने क्षेत्र के पंचांग में दिए समय को प्राथमिकता देना उचित है।

Post a Comment