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भगोड़ों पर शिकंजा या अधूरी लड़ाई? आंकड़ों के पीछे छिपे सवाल भी जरूरी

 

सरकार का दावा है कि पिछले सात वर्षों में 36 देशों से 274 भगोड़े अपराधियों को भारत वापस लाया गया और लगभग 17,874 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की गई। यह निश्चित रूप से कानून प्रवर्तन एजेंसियों की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा सकती है। लेकिन लोकतंत्र में केवल आंकड़ों पर ताली बजाना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उन सवालों का जवाब भी जरूरी है जो इन उपलब्धियों के पीछे खड़े हैं।



यदि कार्रवाई इतनी प्रभावी रही है, तो आखिर इतने बड़े आर्थिक अपराधी देश छोड़कर भाग कैसे गए? क्या हमारी जांच एजेंसियां, बैंकिंग व्यवस्था और निगरानी तंत्र समय रहते उन्हें रोकने में विफल रहे? यदि अपराध होने से पहले व्यवस्था मजबूत होती, तो शायद करोड़ों-अरबों रुपये के घोटालों और विदेश भागने की नौबत ही नहीं आती।


संपत्ति जब्त होना एक चरण है, लेकिन असली सवाल यह है कि पीड़ितों का पैसा कितनी तेजी से वापस मिला? कितने मामलों में मुकदमे अंतिम निर्णय तक पहुंचे और कितनों को सजा मिली? जब तक न्यायिक प्रक्रिया समयबद्ध नहीं होगी, तब तक केवल जब्ती और प्रत्यर्पण की खबरें जनता को अधूरी राहत ही देंगी।


यह भी आवश्यक है कि कानून का शिकंजा केवल चर्चित नामों तक सीमित न रहे। आर्थिक अपराध, बैंक धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और सार्वजनिक धन की लूट करने वाले हर व्यक्ति के खिलाफ समान कार्रवाई हो, चाहे उसका राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक प्रभाव कितना भी बड़ा क्यों न हो।


सरकार की उपलब्धियों का मूल्यांकन होना चाहिए, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है ऐसी व्यवस्था बनाना, जिसमें कोई आर्थिक अपराधी देश छोड़कर भाग ही न सके। मजबूत निगरानी, त्वरित जांच, समयबद्ध न्याय और पारदर्शी कार्रवाई ही इस लड़ाई की वास्तविक सफलता का पैमाना होंगे। जनता अब केवल आंकड़े नहीं, बल्कि जवाबदेही और स्थायी सुधार भी देखना चाहती है।

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