प्रणव बजाज
पांच अगस्त को अनुच्छेद 370 हटाने के सात वर्ष पूरे हो गए। सरकार इसे नए कश्मीर की सबसे बड़ी उपलब्धि बताती है। आतंकवाद पर सख्ती, बेहतर सड़क और रेल संपर्क, रिकॉर्ड पर्यटन, निवेश और विकास की तस्वीरें सामने रखी जाती हैं। लेकिन लोकतंत्र का तकाजा है कि उपलब्धियों के साथ उन सवालों पर भी चर्चा हो, जो अब भी जवाब मांग रहे हैं।
यह सच है कि घाटी में पत्थरबाजी की घटनाएं पहले की तुलना में कम हुई हैं और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हुई है। पर्यटन में बढ़ोतरी हुई, बुनियादी ढांचे पर बड़े निवेश हुए और कई विकास परियोजनाओं को गति मिली। यह भी तथ्य है कि आम जनजीवन पहले की तुलना में अधिक सामान्य दिखाई देता है।
लेकिन क्या यही पूरी कहानी है?
यदि सब कुछ सामान्य हो चुका है, तो सुरक्षा बलों की भारी तैनाती आज भी क्यों जरूरी है? यदि आतंकवाद समाप्त हो गया है, तो समय-समय पर होने वाले आतंकी हमले और सुरक्षा अभियानों की जरूरत क्यों पड़ती है? यदि निवेश का दावा है, तो स्थायी निजी उद्योगों और स्थानीय युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के आंकड़े कितने संतोषजनक हैं?
लोकतंत्र केवल सड़क, सुरंग और पर्यटन से मजबूत नहीं होता। लोकतंत्र की असली ताकत राजनीतिक विश्वास, स्थानीय भागीदारी और नागरिक अधिकारों में दिखाई देती है। कश्मीर में अभी भी कई राजनीतिक और सामाजिक प्रश्न पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। विस्थापित कश्मीरी पंडितों की सुरक्षित और सम्मानजनक वापसी का मुद्दा आज भी अधूरा है। सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों की सुरक्षा, स्थानीय व्यापार की चुनौतियां और युवाओं के लिए स्थायी रोजगार जैसे प्रश्न भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
सरकार को केवल उपलब्धियों का प्रचार नहीं, बल्कि उन कमियों का भी ईमानदारी से मूल्यांकन करना चाहिए जहां अभी और काम की आवश्यकता है। विपक्ष की जिम्मेदारी भी केवल आलोचना करना नहीं, बल्कि ठोस विकल्प और समाधान प्रस्तुत करना है।
कश्मीर न तो केवल राजनीतिक नारा है और न ही चुनावी मुद्दा। यह करोड़ों भारतीयों की संवेदना, राष्ट्रीय सुरक्षा और वहां रहने वाले लोगों के भविष्य का प्रश्न है। इसलिए किसी भी सरकार की सफलता का वास्तविक पैमाना विज्ञापन नहीं, बल्कि यह होगा कि क्या वहां का नागरिक बिना भय के, सम्मान के साथ और स्थायी अवसरों के बीच अपना जीवन जी पा रहा है।
सात वर्ष बाद यह कहना जल्दबाजी होगी कि कश्मीर की हर समस्या समाप्त हो चुकी है। यह भी उतना ही गलत होगा कि कोई बदलाव नहीं आया। सच्चाई इन दोनों दावों के बीच है। जनता अब नारों से नहीं, बल्कि स्थायी शांति, भरोसे, रोजगार और न्याय के परिणाम देखना चाहती है। यही नए कश्मीर की सबसे बड़ी कसौटी होगी।

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