760 कोर्ट केस, 6.62 करोड़ खर्च, महाधिवक्ता को ₹1.83 करोड़; छात्रों का भविष्य अब भी अधर में?
प्रणव बजाज | बौद्धिक प्रतिकार विशेष
मध्य प्रदेश के बहुचर्चित नर्सिंग कॉलेज मान्यता विवाद ने सरकारी खजाने पर भारी बोझ डाल दिया है। विधानसभा में स्वास्थ्य विभाग द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, 1 जनवरी 2022 से अब तक नर्सिंग काउंसिल से जुड़े 760 न्यायालयीन प्रकरण दर्ज हुए। इनमें 599 मामलों का निराकरण हो चुका है, जबकि 161 प्रकरण अभी भी लंबित हैं।
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इन मुकदमों की पैरवी पर अब तक ₹6 करोड़ 62 लाख 44 हजार 795 खर्च किए जा चुके हैं। विपक्ष का आरोप है कि यदि यही राशि नर्सिंग शिक्षा की गुणवत्ता और नए संस्थानों पर खर्च होती, तो हजारों छात्रों को राहत मिल सकती थी।
किस वकील को कितना भुगतान?
विधानसभा में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार प्रमुख अधिवक्ताओं को अब तक निम्न भुगतान किया गया—
अधिवक्ता भुगतान
महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ₹1,83,15,000
अभिनीत अवस्थी (पैनल अधिवक्ता) ₹33,85,000
अरुण त्यागी (पैनल अधिवक्ता) ₹22,54,500
अतिरिक्त महाधिवक्ता भरत सिंह ₹15,37,500
उप महाधिवक्ता अभिनीत अवस्थी ₹10,15,000
अधिवक्ता विवेक खंडेलकर ₹5,70,000
ब्रज डी. सेवल्या ₹3,50,000
निवि त्रिवेदन पैनल ₹3,40,000
हर पेशी की अलग फीस
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार—
महाधिवक्ता प्रशांत सिंह को प्रति पेशी ₹4.95 लाख तक का भुगतान किया गया।
अतिरिक्त महाधिवक्ता भरत सिंह को प्रति पेशी ₹82,500 दिए गए।
पैनल अधिवक्ता अरुण त्यागी को प्रति पेशी ₹75,000 का भुगतान हुआ।
उप महाधिवक्ता अभिनीत अवस्थी सहित अन्य अधिवक्ताओं को प्रति पेशी ₹15,000 तक का भुगतान किया गया।
अभी भी ₹1.32 करोड़ का भुगतान बाकी
सरकार के अनुसार कानूनी पैरवी का कुल दायित्व ₹5.66 करोड़ से अधिक का बना। इसमें से ₹4.34 करोड़ का भुगतान किया जा चुका है, जबकि लगभग ₹1.32 करोड़ का भुगतान अभी शेष है। इसके अतिरिक्त चार विधिक सलाहकारों को वर्ष 2022 से अब तक ₹95,50,295 का भुगतान किया जा चुका है।
सबसे बड़ा नुकसान छात्रों का
इन मुकदमों के कारण हजारों नर्सिंग विद्यार्थियों के परीक्षा परिणाम, प्रवेश और मान्यता से जुड़े मामले वर्षों तक अदालतों में उलझे रहे। छात्र संगठनों का कहना है कि यदि विवादों का समय पर समाधान होता, तो छात्रों को अदालतों के चक्कर नहीं लगाने पड़ते।
बौद्धिक प्रतिकार की पड़ताल
760 मुकदमों की नौबत आखिर क्यों आई?
क्या प्रशासनिक लापरवाही की कीमत सरकारी खजाना चुका रहा है?
यदि मान्यता प्रक्रिया पारदर्शी होती तो क्या करोड़ों रुपये बच सकते थे?
क्या इस पूरे मामले की जवाबदेही तय होगी?
क्या छात्रों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए कोई ठोस योजना बनेगी?
निष्कर्ष:
नर्सिंग घोटाले का सबसे बड़ा नुकसान केवल सरकारी खजाने को नहीं, बल्कि उन हजारों छात्रों को हुआ है जिनका भविष्य वर्षों तक अनिश्चितता में फंसा रहा। अब सवाल केवल खर्च हुए करोड़ों का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय होने का भी है।

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