नई दिल्ली। खाने-पीने की चीजों में मिलावट अब केवल गुणवत्ता का सवाल नहीं रह गई है, बल्कि यह सीधे लोगों की सेहत और भरोसे से जुड़ा मुद्दा बन चुकी है। दूध, मसाले, तेल, मिठाइयां, दालें और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों तक मिलावट की शिकायतें सामने आती रहती हैं। बाजार में बढ़ती मांग और अधिक मुनाफे की चाह ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है।
मिलावट का सबसे बड़ा खतरा यह है कि उपभोक्ता अक्सर असली और नकली उत्पाद के बीच अंतर नहीं कर पाता। रंग, खुशबू और स्वाद सामान्य दिखने के बावजूद किसी खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता खराब हो सकती है। कुछ मामलों में मिलावटी सामग्री लंबे समय तक इस्तेमाल होने पर स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकती है।
त्योहारी मौसम में मिठाइयों और खोया जैसे उत्पादों की मांग बढ़ते ही मिलावट का जोखिम भी बढ़ जाता है। वहीं मसालों और तेल में घटिया या गैर-जरूरी पदार्थ मिलाने से उपभोक्ता को आर्थिक नुकसान के साथ स्वास्थ्य संबंधी परेशानी भी हो सकती है।
सवाल सिर्फ मिलावट करने वालों का नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था का भी है। खाद्य पदार्थों की नियमित जांच, नमूनों की समय पर प्रयोगशाला जांच और दोषियों पर प्रभावी कार्रवाई जरूरी है। केवल छापेमारी या कुछ नमूने जब्त करने से समस्या खत्म नहीं होगी।
उपभोक्ता स्तर पर भी सावधानी जरूरी है। बिना लेबल वाले संदिग्ध उत्पादों से बचना, पैकेट पर निर्माण और समाप्ति तिथि देखना तथा खराब गुणवत्ता की शिकायत संबंधित खाद्य सुरक्षा अधिकारियों तक पहुंचाना महत्वपूर्ण है।
मिलावट का यह मकड़जाल तभी टूटेगा जब मुनाफे के लालच पर कानून का डर भारी पड़े और खाद्य सुरक्षा को केवल कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य की प्राथमिकता माना जाए।

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