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न्याय मिला या सवाल टल गए?

 

प्रणव बजाज

दिल्ली के जंतर-मंतर से अदालत के फैसले तक तीन साल की यह कहानी सिर्फ बृजभूषण शरण सिंह की नहीं, बल्कि देश की न्याय व्यवस्था, खेल संस्थाओं, राजनीति और जनआंदोलनों की भी परीक्षा रही है। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर को बरी कर दिया है। अदालत का फैसला कानून की कसौटी पर अंतिम शब्द होता है और उसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन इस फैसले के साथ कई ऐसे सवाल भी खड़े हैं, जिनका जवाब देश अब भी तलाश रहा है।



जब देश के ओलंपिक और विश्व पदक विजेता खिलाड़ी सड़क पर बैठने को मजबूर हुए, तब खेल महासंघों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठे। यदि आरोप इतने कमजोर थे कि अदालत में टिक नहीं सके, तो तीन वर्षों तक देश को असमंजस में क्यों रखा गया? और यदि महिला खिलाड़ियों की शिकायतें वास्तविक थीं, तो जांच ऐसी क्यों हुई कि अदालत तक पहुंचते-पहुंचते मामला कमजोर पड़ गया?


इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा नुकसान भारतीय कुश्ती की साख को हुआ। खिलाड़ी अखाड़े की बजाय धरनों और अदालतों में दिखाई दिए। खेल राजनीति का अखाड़ा बन गया। विपक्ष ने इसे सरकार के खिलाफ हथियार बनाया, सत्ता पक्ष ने इसे राजनीतिक षड्यंत्र बताया और अंत में सबसे पीछे छूट गया भारतीय खेल।


यह मामला केवल एक व्यक्ति के बरी होने या आरोपमुक्त होने का नहीं है। यह जांच एजेंसियों की गुणवत्ता, खेल संघों की जवाबदेही और महिला खिलाड़ियों के भरोसे का भी मामला है। यदि शिकायतें झूठी थीं तो झूठे आरोप लगाने वालों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यदि जांच में कमी रही तो उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। लोकतंत्र में न तो मीडिया ट्रायल न्याय का विकल्प हो सकता है और न ही केवल आरोप किसी को अपराधी साबित कर सकते हैं।


देश को ऐसी व्यवस्था चाहिए जहां महिला खिलाड़ी बिना भय शिकायत कर सकें, जांच निष्पक्ष और समयबद्ध हो तथा किसी भी मामले का राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर रहकर समाधान हो। तीन साल की इस लड़ाई ने यही सिखाया है कि न्याय में देरी केवल अदालतों की नहीं, संस्थाओं की विश्वसनीयता की भी परीक्षा बन जाती है।


अदालत का फैसला आ चुका है, लेकिन खेल व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा पर बहस अभी समाप्त नहीं हुई है। यही इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सबक है।

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