भोपाल। मध्य प्रदेश में रियल एस्टेट नियामक (रेरा) के आदेशों के बावजूद हजारों घर खरीदारों को अब तक उनका पैसा या मकान नहीं मिल सका है। मार्च 2026 तक प्रदेश में डिफॉल्टर बिल्डरों के खिलाफ लंबित वसूली 393.37 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अकेले भोपाल और इंदौर में 328 करोड़ रुपये, यानी कुल लंबित राशि का लगभग 84 प्रतिशत फंसा हुआ है।
रेरा ने खरीदारों के पक्ष में वसूली प्रमाण-पत्र (आरआरसी) जारी कर दिए, लेकिन जिला प्रशासन स्तर पर वसूली की रफ्तार बेहद धीमी है। नतीजा यह है कि कागजों पर जीतने वाले खरीदार वर्षों बाद भी अपने ही पैसे के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
आंकड़ों के अनुसार, भोपाल में सबसे अधिक मामले लंबित हैं, जबकि इंदौर दूसरे स्थान पर है। इसके बाद ग्वालियर, जबलपुर, राजगढ़ और अन्य शहरों में भी करोड़ों रुपये की वसूली अटकी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आरआरसी जारी होने के बाद भी समयबद्ध कार्रवाई नहीं होती, तो रेरा के आदेशों की प्रभावशीलता पर ही सवाल खड़े होते हैं।
हालांकि कुछ मामलों में अदालतों ने सख्त रुख अपनाया है और एक-दो बिल्डरों के खिलाफ जेल तक की कार्रवाई हुई, लेकिन ऐसे उदाहरण अपवाद हैं। अधिकांश मामलों में न संपत्ति कुर्क हो रही है और न ही खरीदारों को समय पर राहत मिल रही है।
नगरीय विकास विभाग ने अधिकारियों को लंबित मामलों में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित सुधार अभी दिखाई नहीं दे रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वसूली की प्रक्रिया को समयबद्ध, जवाबदेह और कठोर नहीं बनाया जाएगा, तब तक डिफॉल्टर बिल्डरों पर अंकुश लगाना मुश्किल होगा।
रियल एस्टेट क्षेत्र में यह मामला केवल लंबित भुगतान का नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के उस भरोसे का भी है, जिन्होंने जीवनभर की जमा-पूंजी अपने सपनों के घर के लिए निवेश की थी। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि रेरा के आदेशों का वास्तविक असर कब दिखाई देगा और खरीदारों को उनका हक कब मिलेगा?

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