Top News

आरक्षण पर फिर गरमाई सियासत: मायावती का आरएसएस पर हमला, बोलीं—क्रीमी लेयर की सोच एससी-एसटी के सामाजिक अधिकारों के खिलाफ

 

लखनऊ। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने आरएसएस के आरक्षण संबंधी बयान पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा है कि एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर की अवधारणा लागू करना इन वर्गों के सामाजिक अधिकारों और संवैधानिक संरक्षण के मूल उद्देश्य के खिलाफ होगा।



मायावती ने आरएसएस से आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी से बचने और संविधान की भावना का सम्मान करने की अपील की। उनका तर्क है कि एससी-एसटी समुदायों को आरक्षण केवल आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर नहीं, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव और वंचना के कारण मिला है।


क्रीमी लेयर पर असली विवाद क्या है?


क्रीमी लेयर की अवधारणा मुख्य रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण में अपेक्षाकृत संपन्न और प्रभावशाली वर्ग को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने से जुड़ी है। एससी-एसटी आरक्षण में इसे लागू करने का सवाल अलग संवैधानिक और सामाजिक बहस पैदा करता है।


सर्वोच्च न्यायालय के 2024 के फैसले के बाद एससी-एसटी आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण का रास्ता खुला था। इसके बाद यह बहस तेज हुई कि आरक्षण का लाभ उन समुदायों और परिवारों तक किस तरह अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचे, जो अभी भी सबसे अधिक वंचित हैं। हालांकि उप-वर्गीकरण और क्रीमी लेयर को एक ही अवधारणा मानना सही नहीं है।


मायावती की आपत्ति क्यों महत्वपूर्ण?


मायावती लंबे समय से एससी-एसटी आरक्षण में किसी भी ऐसी व्यवस्था का विरोध करती रही हैं, जिससे आरक्षण के मौजूदा संवैधानिक ढांचे में बदलाव हो। 2024 में भी उन्होंने एससी-एसटी आरक्षण में उप-वर्गीकरण संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर असहमति जताई थी।


अब आरएसएस के बयान के बाद मायावती ने इस मुद्दे को सामाजिक अधिकार और संविधान की सुरक्षा से जोड़ दिया है। इससे आने वाले समय में आरक्षण पर भाजपा, आरएसएस और विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है।


बड़ा सवाल


आरक्षण की बहस अब केवल ‘किसे कितना लाभ मिले’ तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि सामाजिक रूप से ऐतिहासिक वंचना झेलने वाले वर्गों के लिए बनाए गए संवैधानिक संरक्षण में आर्थिक या सामाजिक स्थिति को किस सीमा तक आधार बनाया जाए।


यही मुद्दा आने वाले दिनों में संसद से लेकर राज्यों की राजनीति तक बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन सकता है।

Post a Comment

Previous Post Next Post