दागदार अफसरों की जांच छिपी तो खुली पोल, अनुभाग अधिकारी दयानंद उपाध्याय पर गिरी गाज
प्रणव बजाज
भोपाल। लोक निर्माण विभाग में इंजीनियरों की पदोन्नति के लिए तैयार की गई फाइलों ने विभागीय व्यवस्था और दस्तावेजी पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पदोन्नति समिति की बैठक में ऐसे दस्तावेज सामने आने की बात कही जा रही है, जिनमें अधिकारियों के विरुद्ध चल रही विभागीय जांचों की जानकारी और गोपनीय चरित्रावलियों के रिकॉर्ड को लेकर गंभीर अंतर पाए गए।
मामले में विभाग के प्रमुख सचिव सुखवीर सिंह ने अनुभाग अधिकारी दयानंद उपाध्याय को एकतरफा कार्यमुक्त कर उनकी सेवाएं सामान्य प्रशासन विभाग को सौंप दी हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पदोन्नति फाइलों में गंभीर विसंगतियां थीं, तो क्या इसकी जिम्मेदारी केवल अनुभाग अधिकारी तक सीमित है या फाइल तैयार करने और जांचने की पूरी श्रृंखला की भी जवाबदेही तय होगी?
पहला सवाल—जांच में घिरे अफसरों की जानकारी फाइल से गायब कैसे हुई?
लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंता से लेकर मुख्य अभियंता तक पदोन्नति की प्रक्रिया के लिए तैयार फोल्डरों की जांच के दौरान कथित तौर पर कई विसंगतियां सामने आईं।
सबसे गंभीर सवाल उन अधिकारियों को लेकर है, जिनके विरुद्ध विभागीय जांच चल रही थी। आरोप है कि संबंधित जांचों की जानकारी पदोन्नति समिति के सामने रखे गए अभिलेखों में स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं थी।
यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई लंबित हो और वही अधिकारी पदोन्नति के लिए विचाराधीन हो, तो उस जानकारी का समिति के सामने होना बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—फाइल से यह जानकारी गायब हुई तो किस स्तर पर?
सी से मुख्य अभियंता की पदोन्नति में चरित्रावली ने खोला राज
मामले का सबसे गंभीर हिस्सा अधीक्षण अभियंता से मुख्य अभियंता की पदोन्नति से जुड़ा बताया जा रहा है।
यहां अधिकारियों की गोपनीय चरित्रावली के अभिलेखों में अंतर सामने आने की बात कही गई। उपलब्ध विवरण के अनुसार मूल अभिलेखों और तारीखवार प्रविष्टियों से अलग विवरण पदोन्नति के लिए भेजे गए फोल्डर में दिखाई दिया।
पदोन्नति समिति की बैठक में यह अंतर पकड़ में आने के बाद फाइल को वापस भेजकर अभिलेखों के पुनः परीक्षण के निर्देश दिए गए।
यही वह बिंदु है जिसने पूरी पदोन्नति प्रक्रिया पर सवाल खड़ा कर दिया।
२३ पद, पात्र अधिकारी २१—यह अंतर भी जांच के घेरे में
अधीक्षण अभियंता से मुख्य अभियंता पदोन्नति के लिए २३ पदों की स्थिति सामने आई, जबकि मूल्यांकन के दायरे में २१ अधिकारी बताए जा रहे हैं।
पदों और पात्र अधिकारियों की संख्या में अंतर अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं है, लेकिन यह जरूर सवाल पैदा करता है कि पदोन्नति की गणना, पात्रता और रिक्तियों का मिलान किस आधार पर किया गया था।
क्या रिक्त पदों की वास्तविक स्थिति और पात्र अधिकारियों की सूची का विधिवत मिलान किया गया था?
यह सवाल भी अब जांच का हिस्सा बन सकता है।
दयानंद उपाध्याय पर कार्रवाई, लेकिन असली जिम्मेदारी कितनों की?
फाइलों में कथित गड़बड़ी के बाद अनुभाग अधिकारी दयानंद उपाध्याय को कार्यमुक्त किया जाना कार्रवाई का पहला बड़ा कदम है।
लेकिन यहीं से एक बड़ा प्रशासनिक सवाल खड़ा होता है—
फाइल एक अधिकारी अकेला तैयार करता है या उसे कई स्तरों पर जांचा और अनुमोदित किया जाता है?
यदि फाइल तैयार करने के बाद उसे वरिष्ठ अधिकारियों ने देखा, परीक्षण किया और आगे भेजा, तो केवल एक अधिकारी पर कार्रवाई से क्या पूरी जिम्मेदारी तय हो जाएगी?
अब विभाग के सामने यही चुनौती है कि वह यह स्पष्ट करे कि फाइल में कथित विसंगतियां गलती थीं, लापरवाही थी या किसी को लाभ पहुंचाने वाली जानबूझकर की गई कार्रवाई?
पदोन्नति समिति की प्रक्रिया पर भी उठे सवाल
पदोन्नति समिति के सामने प्रस्तुत होने वाले अभिलेख किसी भी अधिकारी के कैरियर को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए गोपनीय चरित्रावली, विभागीय जांच, आरोप-पत्र और अन्य प्रासंगिक अभिलेखों की सही जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध चल रही जांच फाइल में नहीं दिखाई गई, तो समिति के सामने अधिकारी की वास्तविक स्थिति अधूरी तस्वीर के रूप में पहुंच सकती है।
यही वजह है कि इस पूरे मामले में केवल पदोन्नति रोकना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
अब विभाग से पांच सीधे सवाल
पहला— कितने अधिकारियों की फाइलों में विभागीय जांच की जानकारी उपलब्ध नहीं थी?
दूसरा— गोपनीय चरित्रावली में कथित अंतर किस अधिकारी ने दर्ज किया या फाइल में शामिल किया?
तीसरा— फाइल तैयार करने के बाद उसकी जांच किन-किन अधिकारियों ने की?
चौथा— क्या केवल अनुभाग अधिकारी की जिम्मेदारी तय की गई है या पूरी प्रक्रिया की जवाबदेही निर्धारित होगी?
पांचवां— क्या सभी लंबित पदोन्नति फाइलों का स्वतंत्र और निष्पक्ष पुनः परीक्षण कराया जाएगा?
बौद्धिक प्रतिकार की पड़ताल
यह मामला केवल कुछ इंजीनियरों की पदोन्नति रुकने का नहीं है। सवाल सरकारी अभिलेखों की विश्वसनीयता का है।
अगर किसी अधिकारी की विभागीय जांच छिप जाती है, किसी की गोपनीय चरित्रावली बदलती हुई दिखाई देती है और फिर पदोन्नति समिति की बैठक में फाइल वापस करनी पड़ती है, तो व्यवस्था को यह बताना होगा कि फाइलों की निगरानी व्यवस्था आखिर किसलिए है?
दयानंद उपाध्याय पर कार्रवाई हो गई, लेकिन क्या फाइलों में दर्ज हर विसंगति की जिम्मेदारी भी तय होगी?
क्योंकि असली सवाल यही है—
“फाइल किसने बनाई?” से बड़ा सवाल है—“फाइल किसने जांची और किसने आगे बढ़ाई?”
बौद्धिक प्रतिकार आगे इस मामले में पदोन्नति फाइलों, पात्र अधिकारियों की सूची, विभागीय जांचों और गोपनीय चरित्रावलियों के रिकॉर्ड की पड़ताल करेगा।

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