कश्मीरी हिंदू संगठनों ने 1990 के पलायन को केवल ‘विस्थापन’ कहे जाने पर आपत्ति जताते हुए संसद से अलग कानून बनाकर इसे नरसंहार के रूप में मान्यता देने की मांग दोहराई है। उनका कहना है कि हजारों परिवारों ने अपनी इच्छा से घर नहीं छोड़े, बल्कि आतंकवाद, धमकियों और लक्षित हत्याओं के माहौल में घाटी से निकलने को मजबूर हुए।
हालिया मांगों में न्याय, जिम्मेदार लोगों की पहचान, संपत्ति और पुनर्वास तथा सुरक्षित वापसी जैसे मुद्दे शामिल हैं। राज्यसभा में पेश एक निजी विधेयक में भी कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और बड़े पैमाने पर पलायन की जांच के लिए आयोग तथा पुनर्वास पैकेज का प्रस्ताव रखा गया है।
कश्मीरी हिंदू संगठनों का तर्क है कि ‘विस्थापन’ शब्द उस भय और हिंसा की गंभीरता को कम करके दिखाता है, जिसने समुदाय को अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़ने पर मजबूर किया।
**अब मांग सिर्फ घर वापसी की नहीं, बल्कि उस इतिहास की आधिकारिक पहचान और न्याय की भी है।**

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