सावन के अंतिम सोमवार पर भगवान शिव की भक्ति और उनके भक्तों की आस्था से जुड़ी कई कथाएं याद की जाती हैं। इनमें ऋषि मार्कंडेय की कथा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। मान्यता है कि बालक मार्कंडेय अल्पायु थे, लेकिन उनकी अटूट शिवभक्ति ने मृत्यु के देवता यमराज को भी उनके जीवन से दूर कर दिया।
पौराणिक कथा के अनुसार, मृकंडु ऋषि और उनकी पत्नी मरुदमती ने संतान प्राप्ति के लिए भगवान शिव की कठोर तपस्या की। भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्हें दो विकल्प दिए—एक अत्यंत बुद्धिमान लेकिन अल्पायु पुत्र या सामान्य गुणों वाला दीर्घायु पुत्र। दंपती ने बुद्धिमान पुत्र को चुना और मार्कंडेय का जन्म हुआ। उनकी आयु केवल 16 वर्ष निर्धारित थी।
जब उनके जीवन का अंतिम दिन आया, तो मार्कंडेय शिवलिंग से लिपटकर भगवान शिव की आराधना करने लगे। कथा के अनुसार, यमराज उनके प्राण लेने पहुंचे और उन्होंने अपना पाश मार्कंडेय की ओर फेंका। पाश शिवलिंग पर भी पड़ गया। इससे भगवान शिव प्रकट हुए और यमराज को रोक दिया।
मान्यता है कि भगवान शिव ने मार्कंडेय को दीर्घायु होने का वरदान दिया। इसी वजह से मार्कंडेय को शिव के महान भक्तों में गिना जाता है। यह कथा भक्त और भगवान के बीच अटूट विश्वास का प्रतीक मानी जाती है।
सावन सोमवार पर इस कथा का स्मरण करते हुए श्रद्धालु भगवान शिव की पूजा, अभिषेक और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, महादेव अपने सच्चे भक्तों की रक्षा करते हैं और उनकी भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती।

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